UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi

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बाल विकास (UPTET Study Material in Hindi)

विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से सम्बन्ध

UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi : (Comet of Development and Its Relationship with Learning)

UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi

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विकास की अवधारणा

विकास की अवधारणा विकास की प्रक्रिया एक अविरल क्रमिक तथा सतत प्रक्रिया होती है | विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक, क्रियात्मक, संज्ञानात्मक, भाषागत, संवेगात्मक एवं सामजिक विकास होता है | विकास की प्रक्रिया में रुचियों, आदतों, द्रष्टिकोकणों, जीवन-मूल्यों, स्वभाव, व्यक्तिगत, व्यवहार इत्यादि का विकास भी शामिल है |

बल विकास का तात्पर्य- है- बालक के विकास की प्रकिया | बालक के विकास की प्रक्रिया उसके जन्म से पूर्व गर्भ में ही प्रारम्भ हो जाती है | विकास की इस प्रक्रिया में वः गर्भवस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, प्रोढ़ावस्था इत्यादि कई अवस्थाओ से गुजरते हुए परिपक्वता की स्तिथि प्राप्त करता है |

UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi

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बल विकास के अध्ययन में प्राय: निम्नलिखित बातो को शामिल किया जाता है |

  1. जन्म लेने से पूर्व एवं जन्म लेने के बाद परिपक्व होने तक बालक में किस प्रकार के परिवर्तन होते है ?
  2. बालक में होने वाले परिवर्तनों का विशेष आयु के साथ क्या सम्बन्ध होता है ?
  3. आयु के साथ होने वाले परिवर्तनों का क्या स्वरूप होता है ?
  4. बालको में होने वाले उपरोक्त परिवर्तनों के लिए कौन-से कारक जिम्मेदार होते है ?
  5. बालक में समय-समय पर होने वाले उपरोक्त परिवर्तन उसके व्यवहार को किस प्रकार से प्रभावित करते है ?
  6. क्या पिछले परिवर्तनों के आधार पर बालक में भविष्य में होने वाले गुणात्मक एवं परिमाणात्मक परिवर्तनों की भविष्यवाणी की जा सकती है ?
  7. क्या सभी बालको में वृद्धि एवं विकास सम्बन्धी परिवर्तनों का स्वरूप एक जैसा होता है अथवा व्यक्तिगत विभिन्नता के अनुरूप इनमे अंतर होता है ?
  8. बालको में पाए जाने वाले व्यक्तिगत विभिनताओ के लिए किस प्रकार के आनुवंशिक एवं परिवेशजन्य प्रभाव उत्तरदायी होते है ?
  9. बालक के गर्भ में आने के बाद निरंतर प्रगति होती रहती है | इस प्रगति का विभिन्न आयु तथा अवस्था विशेष में क्या स्वरूप होता है ?
  10. बालक की रुचियों, आदतों, द्रष्टिकोणों, जीवन-मूल्यों, स्वभाव तथा उच्च व्यक्तिगत एवं व्यवहार-गुणों में जन्म के समय से ही जो निरन्तर परिवर्तन आते रहते है उनका विभिन्न आयु वर्ग तथा अवस्था विशेष में क्या स्वरूप होता है तथा इस परिवर्तन की प्रक्रिया की क्या प्रक्रति होती है |

वृद्धि एवं विकास में अंतर

वृद्धि एवं विकास का प्रयोग लोग प्राय: प्रयावाची शब्दों के रूप में करते है | अवधारणात्मक रूप से देखा जाये, तो इन दोने में अन्तर होता है | इस अन्तर को हम अग्र प्रकार से व्यक्त कर सकते है |

वृद्धि

1.वृद्धि शब्द का प्रयोग परिमाणात्मक परिवर्तनों; जैसे-बच्चे के बड़े होने के साथ उसके आकार, लम्बाई, ऊंचाई, इत्यादि के लिए होता है |

2. वृद्धि विकास की प्रक्रिया एक चरण होता है | इसका क्षेत्र सिमित होता है

3. वृद्धि की क्रिया आजीवन नही चलती, बालक के परिपक्व होने के साथ ही यह रुक जाती है

4. बालक की शारीरिक वृद्धि हो रही है इसका अर्थ यह नही हो सकता की उसमे विकास भी हो रहा है |

विकास

विकास शब्द का प्रयोग परिमाणात्मक परिवर्तनों के साथ साथ व्यावहारिक परिवर्तनों, जैसे-कार्यकुशलता, कार्यक्षमता, व्यवहार में सुधर इत्यादि के लिए भी होता है |

विकास अपने आप में एक विस्तृत अर्थ रखता है | वृद्धि इसका एक भाग होता है |

विकास एक सतत प्रक्रिया है | बालक के परिपक्व होने के बाद भी यह चलती रहती है |

बालक में विकास के लिए भी वृद्धि आवश्यक नही है |

मानव विकास की अवस्थाएँ

मानव विकास एक सतत प्रक्रिया है | शारीरिक विकास तो एक सीमा (परिपक्वता प्राप्त करने) के बाद रुक जाता है, किन्तु मनोशारीरिक क्रियाओ में विकास निरन्तर होता रहता है | इन मनोशारीरिक क्रियाओ के अन्तर्गत मानसिक, भाषायी, संवेगात्मक, सामाजिक एवं चारित्रिक विकास आते है | इनका विकास विभिन्न आयु स्तरों में भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है | इन आयु स्तरों को मानव विकास की अवस्थाएँ कहते है | भारतीय मनीषियों ने विकास की अवस्थाओ को सात कालो में विभाजित किया है |

  1. गर्भवस्था गर्भधान से जन्म तक ?
  2. शैशवावस्था जन्म से 5 वर्ष तक |
  3. बाल्यावस्था 5 वर्ष से 12 वर्ष तक |
  4. किशोरावस्था 12 वर्ष से 18 वर्ष तक |
  5. युवावस्था 18 वर्ष से 25 वर्ष तक |
  6. प्रौढ़ावस्था 25 वर्ष से 55 वर्ष तक |
  7. वृद्धावस्था 55 वर्ष से म्रत्यु तक |

इस समय अधिकतर विद्वान् मानव विकास का अध्ययन निम्नलिखित चार अवस्थाओ के अन्तर्गत करते है

  1. शैशवावस्था जन्म से 6 वर्ष तक |
  2. बाल्यावस्था 6 वर्ष से 12 वर्ष तक |
  3. किशोरावस्था 12 वर्ष से 55 वर्ष तक |
  4. वयस्कावस्था 18 वर्ष से म्रत्यु तक |

शिक्षा की द्रष्टि से प्रथम तीन अवस्थाएँ महत्त्वपूर्ण है, इसलिए मनोविज्ञान में इन्ही तीन अवस्थाओ में होने वाले मानव विकास का अध्ययन किया जाता है |

शैशवावस्था

जन्म से 6 वर्ष तक की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है | इनमे जन्म से 3 वर्ष तक बच्चो का शारीरिक एवं मानसिक विकास तेजी से होता है | शैशवावस्था में अनुकरण एवं दोहराने की तिर्व प्रवत्ति बच्चो में पाई जाती है | इस काल में बच्चो का समाजीकरण भी प्रारम्भ हो जाता है | इस काल में जिज्ञासा की तीव्र प्रवत्ति बच्चो में पाई जाती है | मनोवैज्ञानिको की द्रष्टि से यह काल भाषा सिखने की सर्वोत्तम अवस्था है | इन्ही सब कारणों से यह काल शिक्षा की द्रष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है |

बाल्यावस्था (UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi)

6 वर्ष से 12 वर्ष तक की अवस्था को बाल्यावस्था कहा जाता है | बाल्यावस्था के प्रथम चरण 6 से 9 वर्ष में बालको की लम्बाई एवं भार दोनों बढ़ते है | इस काल में बच्चो में चिन्तन एवं तर्क शक्तियों का विकास हो जाता है | इस काल के बाद से बच्चे पढ़ाई में रूचि लेने लगते है | शैशवावस्था में बच्चे जहाँ भुत तीव्र गति से सीखते है वही बाल्यावस्था में सीखने की गति मन्द हो जाती है, किन्तु उनके सिखने का क्षेत्र शैशवावस्था की तुलना में विस्तृत हो जाता है | मनोवैज्ञानिको की द्रष्टि से इस अवस्था में बच्चो की शिक्षा के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग करना चाहिये |

किशोरावस्था 12 वर्ष से 18 वर्ष तक की अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है | यह वह समय होता है जिसमे व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की और उन्मुख होता है | इस अवस्था में किशोरों की लम्बाई एवं भार दोनों में वृद्धि होती है, साथ ही मांसपेशियों में भी वृद्धि होती है | 12-14 वर्ष की आयु के बीच लडको की अपेक्षा लडकियों की लम्बाई एवं मांसपेशियों में तेजी से वृद्धि होती है एवं 14-18 वर्ष की आयु के बीच लडकियों की अपेक्षा लडको की लम्बाई एवं मांसपेशियां तेजी से बढ़ती है | इस काल में प्रजनन अंग विकसित होने लगते है एवं उनकी काम की मूल प्रव्रत्ति जाग्रत होती है | इस अवस्था में किशोर-किशोरीयो की बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है, उनके ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता बढ़ जाती है, स्मरण शक्ति बढ़ जाती है एवं उनमे स्थायित्व आने लगता है | इस अवस्था में व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्धो में वृद्धि होती है | यौन समस्या इस अवस्था की सबसे बड़ी समस्या होती है | इस अवस्था में नशा या अपराध की और उन्मुख होने की अधिक सम्भावना रहती है, इसलिए इस अवस्था को जीवन के तूफान का काल भी कहा जाता है |

विकास को प्रभावित करने वाले कारक (UPTET Study Material in Hindi)

विकास एक सतत, लगातार तथा न रुकने वाली प्रक्रिया है | विकास से बच्चे में आये सभी परिमाणात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तनों का संकेत मिलता है | यह जन्म से लेकर म्रत्यु तक चलता रहता है | विकास पर माँ-बाप, घर का वातावरण, अडोस-पडोस, बाहर का वातावरण, सीखने, परिपक्वता तथा आनुवांशिक कारको का भी बहुत प्रभाव पड़ता है | ये सभी बाते बच्चे के विकास पर प्रत्यक्ष रूप से अपनी छाप छोडती है |

 

(UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi) अधिगम

अधिगम का अर्थ है अपने अनुभव के अनुसार अपने भविष्य के व्यवहार में परिवर्तन लाना अर्थात् अपने आपको बदल लेना | अनुभव द्वारा व्यक्ति अपने वातावरण के अनुसार विशेष स्तिथियों के लिए विशेष प्रकार की परिस्तिथि का चुनाव का चुनाव कर लेता है | अधिगम एक प्रकार का मानसिक परिवर्तन है | इसे एक प्रकार की मानसिक व्यवस्था भी कहा जा सकता है | अलग-अलग मनोवैज्ञानिको ने अधिगम से अलग-अलग परिभाषाएं दी है

गेट्स (Gates) के अनुसार-“अनुभव द्वारा व्यवहार में रूपान्तर लाना ही अधिगम है |”

ई. ए. पील (E.A. Peel) के अनुसार- “अधिगम व्यक्ति में एक परिवर्तन है जो उसके वातावरण के परिवर्तनों के अनुसरण में होता है |”

विकास के विभिन्न आयाम (UPTET Study Material in Hindi)

बाल विकास को वैसे तो कई आयामों में विभाजित किया जा सकता है, किन्तु बाल-विकास एवं बाल मनोविज्ञान के अध्ययन के द्रष्टिकोण से इसके निम्नलिखित आयाम महत्त्वपूर्ण है

  1. शारीरिक विकास
  2. मानिसक विकास
  3. भाषाई विकास
  4. सामाजिक विकास
  5. सवेगिक विकास
  6. मनोग्यात्मक विकास

शारीरिक विकास (UPTET Study Material in Hindi) इसके अन्तर्गत बालक के शरीर के बाह्य परिवर्तन: जैसे-ऊँचाई, शारीरिक अनुपात में वृद्धि इत्यादि स्पष्ट दिखाई पड़ते है | आन्तरिक अवयवो के परिवर्तन बाह्य रूप से सिखाई पड़ते है | आन्तरिक अवयवो के परिवर्तन बाह्य रूप से दिखाई पड़ते, किन्तु शारीर के भीतर इनका समुचित विकास होता रहता है | शारीरिक वृद्धि एवं विकास की प्रक्रिया व्यक्तित्व के उचित समायोजन और विकास के मार्ग में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है | प्रारम्भ में शिशु अपने हर प्रकार के कार्यो के लिए दुसरो पर निर्भर रहता है, धीरे-धीरे विकास की प्रक्रिया व्यक्तित्व के उचित समायोजन और विकास के मार्ग में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है | प्रारम्भ में शिशु अपने हर प्रकार के कार्यो के लिए दुसरो पर निर्भर रहता है, धीरे धीरे विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप व अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम होता जाता है | शारीरिक वृद्धि एवं उसकी देखभाल का भी शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर प्रभाव पड़ता है | यदि बच्चे को प्रयाप्त मात्रा में पोषक आहार उपलब्ध नही हो रहे है तो उसके विकास की सामन्य गति की आशा कैसे की जा सकती है ?

शारीरिक वृद्धि एवं विकास के बारे में शिक्षको को पर्याप्त जानकारी होनी चाहिये | इसी जानकारी के आधार पर वह बालक के स्वास्थ्य अथवा इससे सम्बन्धित अन्य समस्याओ से अवगत हो सकता है | बालक के वृद्धि एवं विकास के बारे में शिक्षको को पर्याप्त जानकारी इस लिए भी रखनी अनिवार्य है, क्योकि बच्चो की रुचियाँ, इच्छाएँ, द्रष्टिकोण एवं एक तरह से उसका पूर्ण व्यवहार शारीरिक वृद्धि एवं विकास पर ही निर्भर करता है | बच्चो की शारीरिक वृद्धि एवं विकास के समान्य ढाँचे से परिचित होकर अध्यापक यह जान सकता है की एक विशेष आयु स्तर पर बच्चो से क्या आशा की जा सकती है ?

बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र (UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi)

मानसिक विकास (UPTET Study Material in Hindi) संज्ञानात्मक विकास से तात्पर्य बालक की उन सभी मानिसक योग्यताओ एवं क्षमताओ में वृद्धि और विकास से है जिसके परिणामस्वरूप वह अपने निरन्तर बदलते हुए वातावरण में ठीक पराक्र समायोजन करता है और विभिन्न प्रकार की समस्याओ को सुलझाने में अपनी मानसिक शक्तियों का पर्याप्त उपयोग कर पाटा है | कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरिक्षण करना, समस्या समाधान करना, निर्णीय लेना, इत्यादि की योग्यता संज्ञानात्मक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होते है | धीरे-धीरे आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमे मानसिक विकास की गति भी बढ़ती रहती है | संज्ञानात्मक विकास के बारे में शिक्षको को पर्याप्त जानकारी इसलिए होनी चाहिये, क्योकि इसके अभाव में वह बालको की इससे सम्बन्धित समस्याओ का समाधान नही कर पायेगा | यदि कोई बालक मानसिक रूप से कमजोर है, तो इसके क्या कारण है, यह जानना उसके उपचार के लिए आवश्यक है | संज्ञानात्मक विकास के बारे में पर्याप्त जानकारी होने से विभिन्न आयु स्तरों पर पाठ्यक्रम, सहगामी क्रियाओ तथा अनुभवो के चयन और नियोजन में सहायता मिलती है | किस विधि और तरीके से पढ़ाया जाये, सहायक सामग्री तथा शिक्षण साधन का प्रयोग किस तरह किया जाए, शैक्षणिक वातावरण किस प्रकार का हो, इन सबके निर्धारण में संज्ञानात्मक विकास के विभिन्न पहलुओ की जानकारी शिक्षको के लिए सहायक साबित होती है | विभिन्न अवस्थाओ और आयु-स्तर पर बच्चो की मानसिक वृद्धि और विकास को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त पाठ्य पुस्तके तैयार करने में भी इससे सहायता मिल सकती है |

भाषायी विकास  (UPTET Study Material in Hindi) भाषा का विकास एक प्रकार का संज्ञानात्मक विकास ही है | मानसिक योग्यता की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है | भाषा का तात्पर्य होता है वह सांकेतिक साधन, जिसके माध्यम से बालक अपने विचारो एवं भावो का सम्प्रेष्ण करता है तथा दुसरो के विचारो एवं भावो को समझता है | भाषायी योग्यता के अन्तर्गत मौखिक अभिव्यक्ति, सांकेतिक अभिव्यक्ति, लिखित अभिव्यक्ति शामिल है | भाषायी योग्यता एक कौशल है, जिसे अर्जित किया जाता है | इस कौशल को अर्जित करने की प्रक्रिया बालक के जन्म के साथ ही प्रारम्भ हो जाती है | अनुकरण, वातावरण के साथ अनुक्रिया तथा शारीरिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओ की पूर्ति की मांग इसमें विशेष भूमिका निभाती है | यह विकास बालक में धीरे धीरे एक निश्चित क्रम में होता है | जन्म से लेकर आठ महीने से 12 महीने के बीच वह तीन या चार शब्दों को समझने लगता है | डेढ़ वर्ष के भीतर उसे 10 से 12 शब्दों की जानकारी हो जाती है | 2 वर्ष की आयु तक उसे दो सौ से अधिक शब्दों की जानकारी हो जाती है | 3 वर्ष के भीतर ही बालक लगभग एक हजार शब्दों को समझने लगता है | इसी तरह उसमे भाषायी विकास होते रहते है और 16 वर्ष की आयु तक बालक लगभग एक लाख शब्दों को समझने की योग्यता विकसित कर लेता है | भाषायी विकास की प्रक्रिया में लिखने एवं पढ़ने का भी ज्ञान उसमे धीरे धीरे ही होता है |बाल्यावस्था में वह धीरे-धीरे एक-एक शब्द को पढ़ता एवं लिखता है, उसके बाद उसके इन कौशलो में गति आती जाती है | शिक्षको को भाषा के विकास की प्रक्रिया का सही ज्ञान होना इसलिए अनिवार्य है, क्योकि इसी के आधार पर बालक की भाषा से सम्बन्धित समस्याएँ जैसे-अस्पष्ट उच्चरण, गलत उच्चारण, तुतलाना, हकलाना, तीव्र अस्पष्ट वाणी इत्यादि का समाधान कर सकता है | बालक की शिक्षा में लिखने, पढ़ने एवं बोने की योग्यता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है | इन सभी योग्यताओ के विकास में भाषा के विकास की प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है इसलिए इसकी जानकारी शिक्षको को अवश्य होनी चाहिये |

सामाजिक विकास मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है | बालक में सामाजिक भावनाओ का विकास जन्म के बाद ही शुरू होता है | वृद्धि एवं विकास के अन्य पहलुओ की तरह ही सामाजिक गुण भी बच्चे में धीरे-धीरे पनपते है | इन गुणों के विकास की प्रक्रिया, जो बच्चे के सामाजिक व्यवहार में वांछनीय परिवर्तन लाने का कार्य सम्पन्न करती है, सामाजिक विकास अथवा समाजीकरण के नाम से जानी जाती है | सामाजिक वृद्धि एवं भली-भांति समायोजन करने की योग्यता | सामाजिक विकास की प्रक्रिया व्यक्ति को सामाजिक मान्यताओ, रीती-रिवाजो और परमपराओ के अनुकूल आचरण करने में पूरी-पूरी सहायता कृति है और इस तरह से अपने समाजिक परिवेश में ठीक प्रकार से स्मजोजित होने में समर्थ बनाती है | शारीरिक ढाँचा, स्वास्थ्य, बुद्धि, संवेगात्मक विकास, परिवार, परिवारिक वातावरण, सामाजिक वातावरण, इत्यादि व्यक्ति के सामाजिक विकास को प्रभावित करते है | शिक्षा के कई उद्देश्यों में एक बालक का सामाजिक विकास भी होता है | यदि सामाजिक विकास इसके अन्य पहलुओ की जानकारी शिक्षको को न हो तो बालक का पर्याप्त विकास नही हो सकता एवं शिक्षा का उद्देश्य भी पूरा नही होगा, इसलिए शिक्षको को बालक में सामाजिक विकास की प्रक्रिया की पूरी जानकारी होनी चाहिये |

सांवेगिक विकास (UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi) 

संवेग जिसे भाव भी कहा जाता है का अर्थ होता है ऐसी अवस्था जो व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है | भय, क्रोध, घ्रणा, आश्चर्य, स्नेह, विषाद, इत्यादि संवेग के उदाहरन है | बालक में आयु बढ़ने के साथ ही इन संवेगों का विकास भी होता रहता है | संवेगात्मक विकास मानव वृद्धि एवं विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है | व्यक्ति का संवेगात्मक व्यवहार उसके शारीरिक वृद्धि एवं विकास को ही प्रभावित नही, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है | प्रत्येक संवेगात्मक अनुभूति व्यक्ति में कई प्रकार के शारीरिक और शरीर सम्बन्धी परिवर्तनों को जन्म देती है |

संवेगात्मक विकास के कई कारक होते है, इन कारको की जानकारी अध्यापको को होनी चाहिये | जैसे भय का कारण क्या है ? यह जाने बिना बालक के भय को दूर नही किया जा सकता | बालक के सन्तुलित विकास में उसके संवेगात्मक विकास की अहम भूमिका होती है | संवेगात्मक विकास के द्रष्टिकोण से बालक के स्वास्थ्य एवं शारीरिक विकास पर पूरा-पूरा ध्यान देने की आवश्यकता पडती है | बालक के संवेगात्मक विकास पर पारिवारिक और क्रिया-कलापों को उचित प्रकार से संगठित कर अध्यापक बच्चो के संवेगात्मक विकास में भरपूर योगदान दे सकते है | बालको को शिक्षको का प्रयाप्त सहयोग एवं स्नेह मिलना उनके व्यक्तित्व के विकास के द्रष्टिकोण से आवश्यक है | इसी प्रकार यह भी ध्यान रखा जाना चाहिये की बालक के स्वाभिमान को कभी ठेस न पहुँचे | इस तरह संवेगात्मक विकास के कई पहलुओ को ध्यान में रखकर ही बालक का सर्वागीण विकास किया जा सकता है |

मनोगत्यात्मक विकास (UPTET 2017 Bal Vikas Adhigam Study Material in Hindi)

क्रियात्मक विकास का अर्थ होता है-व्यक्ति की क्रियात्मक शक्तियाँ, क्षमताएँ या योग्यताओ का अर्थ होता है ऐसी शारीरिक गतिविधियाँ या क्रियाएँ जिनको सम्पन्न करने के लिए मांसपेशियों एवं तंत्रिकाओ की गतिविधियों के संयोजन की आवश्यकता होती है; जैसे-चलना, बैठना, इत्यादि | एक नवजात शिशु ऐसे कार्य करने में अक्षम होता है | शारीरिक वृद्धि एवं विकास के साथ ही उम्र बढ़ने के साथ उसमे इस तरह की योग्यताओ का भी विकास होने लगता है | क्रियात्मक विकास बालक के शारीरिक विकास, स्वस्थ रहने, स्वावलम्बी होने एवं उचित मानसिक विकास में सहायक होता है | इसके कारण बालक को आत्मविश्वास अर्जित करने में भी सहायता मिलती है | पर्याप्त क्रियात्मक विकास के अभाव में बालक में विभिन्न प्रकार के कौशलो के विकास में बाधा पहुँचती है |

क्रियात्मक विकास के स्वरूप एवं उसकी प्रक्रिया का ज्ञान होना शिक्षको के लिए आवश्यक है | इसी ज्ञान के आधार पर ही वह बालक में विभिन्न कौशलो का विकास करवाने में सहायक हो सकता है | क्रियात्मक विकास के ज्ञान से शिक्षको को यह भी पता चलता है की किस आयु विशेष या अवस्था में बालक में किस प्रकार के कौशलो की योग्यता अर्जित करने की योग्यता होती है | जिन बालको में क्रियात्मक विकास सामान्य से कम होता है, उनके समायोजन एवं विकास हेतु विशेष कार्य करने की आवश्यकता होती है |

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