SSC CGL TIER 1 Poverty Unemployment Study Material in Hindi

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निर्धनता एवं बेरोजगारी Poverty and Unemployment (SSC CGL TIER 1 Poverty Unemployment Study Material in Hindi)

निर्धनता

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निर्धनता का अर्थ उस स्थिति से है, जिसमें समाज का एक भाग अपने जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहता है।

सामान्यत: निर्धनता मापने की दो विधियाँ हैं

निरपेक्ष निर्धनता इसमें राष्ट्रीय स्तर पर संसाधनों के अनुरुप परिमाणात्मकता के आधार पर जीवित स्तर निर्धारित किया जाता है और स्तर के नीचे के लोगों को निर्धन कहा जाता है। भारत जैसे अल्पविकसित देशों में निर्धनता मापने के लिए यह तरीका ज्यादा उपयुक्त है।

सापेक्ष निर्धनता  इसमें उच्च आय वर्गों तथा निम्न आय वर्गो के बीच तुलना की जाती है तथा यह देखा जाता है कि विभिन्न आय वर्गो के बीच कितनी विषमता है। इसे प्राय: गिनी गुणांक तथा लॉरेन्ज वक्र द्वारा मापा जाता हैं। यह विधि विकसित देशों में निर्धनता मापने के लिए ज्यादा उपयुक्त है।

भारत में सर्वप्रथम (1967-68) गरीबी का अध्ययन वर्ष 1870 में दादाभाई नौरोजी ने किया, इसके पश्चात श्री बी. एस. मिन्हास ने वर्ष 1958-59 तथा 1967-68 के मध्य ग्रामीण निर्धनों की प्रतिशतता में कमी के संकेत दिए। योजना आयोग ने सितम्बर, 1989 में प्रो. डी.टी. लकडावाला की अध्यक्षता में एक विशेष समूह की नियुक्ति की , जिसने प्रति व्यक्ति कैलोरी उपभोग को आधार बनाते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति तथा शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति को आधार माना।

  • लकडावाला समिति ने अपने फॉर्मूले में शहरी निर्धनता के आकलन के लिए औद्दोगिक श्रमिकों के उपभोक्ता नूल्य सूचकांक एवं ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को आधार बनाया
  • प्रधानमन्त्री की आर्थिक सलाहकार समिति के पूर्व अध्यक्ष सुरेश तेन्दुलकर की रिपोर्ट गरीबी का आँकड़ा 37.2% बताती है।
  • ग्रामीण जनसंख्या का चलगभग 41.8% तथा शहरी जनसंखाया का 25.7% भाग गरीब है। देश में निर्धनता अनुपात का आकलन योजना आयोग द्वारा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (NSSO) के माध्यम से किया जाता है।
  • इसके अनुसार 2004-05 में भारत में कुल 27.5% लोग गरीबी रेखा के नीचे थे जिसमें 28.3% ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 25.7%शहरी क्षेत्रों में गरीबी थी।

निर्धनों की निरपेक्ष संखाया के मामले में उत्तर प्रदेश का स्थान जहाँ सबसे उपर है, वही निर्धनता अनुपात के मामले में (कुल जनसंख्या में निर्धन जनसंख्या का प्रतिशत) ओडिशा (46.4%) का स्थान सर्वोच्च है।

बेरोजगारी (Unemployment)

बेरोजगारी से तात्पर्य एक ऐसी स्थिति से है, जब देश में कार्य करने वाली जनशक्ति अधिक होती है, और काम करने के लिए भी राजी होती है परन्तु उन्है प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य नही  मिल पाता।

भारत में बेरोजगारी (Poverty Unemployment Study Material in Hindi)

भारत में पाई जाने वाली बेरोजगारी को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किय जा सकता है

सरचनात्मक बेरोजगारी  आर्थिक विकास होने के कारण नये-नये उद्दोगों का विकास होता है, जिससे बाजार प्रतियोगिता में वृद्धि होती है। इस तीव्र प्रतियोगिता का सामना नही कर पाने के कारण कुछ उद्दोग बन्द हो जाते है जिससे उनमें लगे चकामगार बेरोजगार हो जाते है। इस प्राकर की बैरोजगारी को ही हम सरचनात्मक बेरोजगारी कहते हॆ।

घर्षणात्मक बेरोजगारी   बाजार की दशाओं (माँग की पूर्ति) में परिवर्तन होने से उत्पन्न बैरोरजगारी को घर्षणात्मक बेरोजगारी कहते है। उदाहरणस्वरुप दितीय विश्व युद्ध के पश्चात  युद्धकालीन उद्दोगों की माँग में कमी  आने से बन्द कर दिए गए. जिससे उसमें लगे सारे कामगार बेरोजगार हो गए।

शिक्षित बेरोजारी शिक्षित बेरोजगारी से आश्य उस स्थिति से हे जब एक शिक्षित व्यक्ति को उसकी योग्यतानुसार कार्य नही मिलता है ओर वह बेरोजगारी से ग्रसित हो रजाता है।

खुली बेरोजागी यह बेरोजगारी का सबसे वीभत्स रुप है। इसमें श्रमिकों को बिना काम किए ही रहना पडता है । उन्हे थोड़ा काम भी नही मिल पाता है।

अल्परोजगार

यह बेरोजगारी से आशय उस स्थिति से है जिसमें श्रमिकों को कार्य तो मिलता है परन्तु उत्पादन में उनका कुछ अशों तक का ही योगदान होता है अर्थात या तो उनकी क्षमता के अनुसार कार्य नहीं मिलता या फिर वे एक वर्ष में कुछ महीने ही कार्य कर पाते है।

अदृश्य बेरोजगारी या छिपी हुई बेरोजगारी (Poverty Unemployment Study Material in Hindi)

जब किसी कार्य को करने में आवश्यकता से अधिक श्रमिक लगे होते है तथा उन अतिरिक्त श्रमिकों को निकाल देने से कुल उत्पादन में कोई प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ता हो अर्थात इन अतिरिक्त श्रमिको की सीमान्त उत्पादकता शून्य है, तो इसे हम अदृश्य बेरोजगारी कहते है।

मौसमी बेरोजगारी (Poverty Unemployment Study Material in Hindi)

यह मुख्य रुप से कृषि क्षेत्र में पाई जाती है क्योकि कृषि मेंलगभग 7 से 9 महीने ही श्रम की आवश्यकता होती है । इस प्रकार वर्ष के शेष महीनों में  वहाँ के श्रमिक बेरोजारी का सामना करते है।

 

 

 
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