CTET UPTET Shiksha Shastra Pedagogy kaksha ke bahuaayaamee srot Study Material in Hindi

CTET UPTET Shiksha Shastra Pedagogy kaksha ke bahuaayaamee srot Study Material in Hindi

CTET UPTET Shiksha Shastra Pedagogy kaksha ke bahuaayaamee srot Study Material in Hindi

CTET UPTET Shiksha Shastra Pedagogy kaksha ke bahuaayaamee srot Study Material in Hindi

CTET UPTET Shiksha Shastra Pedagogy kaksha ke bahuaayaamee srot Study Material in Hindi

कक्षा के बहुआयामी स्रोत (CTET UPTET Study Material)

भाषा शिक्षण में पाठ्य पुस्तक तथा मल्टीमीडिया माध्यमों के अतिररिक्त कक्षा में अन्य बहुआयमी स्रोतों के माध्यमों के अतिरिक्त कक्षा में अन्य बहुआयामी स्रोतो के माध्यम से भाषा शिक्षण को और अधिक सरल तथा सुगम बनाया जा सकता है। ये स्त्रोत मुख्यत: दृश्य सामग्री के रूप में होते है, इनका विवरण निम्न प्रकार है

  1. वास्तविक पदार्थ (Real Objects) वास्तविक पदार्थो का तात्पर्य मूल वस्तुओं से है। वास्तविक पदार्थ बालकों की इन्द्रियों को प्रेरणा देते हैं तथा उन्हें निरीक्षण एवं परीक्षण के अवसर प्रदान करके उनकी अवलोकन शक्ति का विकास करते हैं। ध्यान देने की बात है कि जब बालगक वास्तविक पदार्थों को देखते, छूते तथा चखते हैं तो उनकी क्रमश: दृष्टिकस स्वर्शावण तथा रस चखते हैं को उनकी क्रमश: दृष्टिक, स्पर्शावण तथा रस प्रतिभाँए निर्मित होती हैं। ये प्रतिभाएँ बालकों की कल्पना शक्ति को विकसित करने में सहयोग प्रदान करती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविक पदार्थो के प्रयोग से बालकों को नाना प्रकार के वास्तविक पदार्थों के प्रयोग से बालको को नाना प्रकार के अनुभव प्राप्त होते है जो दूसरों के द्वारा दिए गए अनुभवों की अपेक्षा कही अधिक उत्तम होते हैं। स्पष्ट हे कि बालकों को मेज, कुर्सी, रोटी, कपड़ा, फल तथा थर्मामीटर एवं भौतिक तुला आदि का ज्ञान देने के लिए जितना स्पष्ट ज्ञान उक्त सभी वास्तविक पदार्थो का स्कूल के संग्रहालय (Museum) में संग्रह करें जिससे उन्हे बालकों के सामने आवश्यतनुसार प्रदर्शित किया जा सके।

CTET UPTET Previous Year Study Material in Hindi

  1. प्रतिमान (Models) प्रतिमान वास्तविक पदार्थो अथवा मूल वस्तुओं के छोटे रूप होते हैं। इनका प्रयोग उस समय किया जात है जब वास्तुविक पदार्थ या तो उपलब्ध न हो अथवा इतने बड़े होते है कि उन्हें कक्षा में उपस्थित नहीं किया जा सकता। अत: बालकों को उक्त सभी का ज्ञान देने के लिए उनके नमूने दिखाए जाते हैं। स्मरण रहै कि नमूने बड़े हो अथवा छोटे वास्तविक पदार्थो से मिलते –जुलते होने चाहिए। कभी- कभी ऐसा भी होता है कि नमूने वास्तविक परदार्थों से भी अच्छे होते हैं। इसका कारण यह कि इन्हें ठीक प्रकार से देखा जा सकता है। ध्यान देने की बात है कि यदि नमूनों में वास्तविक पदार्थों के विविध रूप स्पष्ट रूप से दिअई देंगे तो वे बालकों की कल्पना शक्ति विकसित करते हुए शिक्षक को उददेश्य प्राप्प करने में सहयता कर सकते है, अन्यथा नहीं। इस दृष्टि से नमूनों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इनकी सहायता से बालकों को ऐतिहासिक, भौगोलिक तथा वैज्ञानिक सभी प्रकार के तथ्यों का ज्ञान सरलतापूर्वक दिया जा सकता है। अत: बालकों को जो भी नमूने दिए जाएँ, वे अत्यन्त आकर्षक होने चाहिए। चूँकि नमूनों में लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई तीनों स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती हैं इसलिए ये चित्रों की अपेक्षा कहीं अधिक लाभदायक होते हैं। इस दृष्टि से यदि शिक्षक को किसी कारण से बने बनाए नमूने न मिल सके तो उस उनका निर्माण स्वयं करना चाहिए। साथ ही उनका प्रयोग करते समय बालकों को वास्तविक पदार्थों के आकार का बोध भी करा देना चाहिए। इससे उनकी वास्तविक पदार्थों के प्रति गलत धारणा नहीं बनेगी।
  2. अचल चित्र (Still Pictures) चित्रों का प्रयोग उस समय किया जाता है जब न तो वास्तिक पदार्थों तथा नमूनों का मिलना कठिन हो जाता है तो ऐसी स्थिति में चित्रों का प्रयोग किया जाता है। स्मरण रहै कि चित्रों से वास्तविक पदार्थों के स्पर्श के सम्बन्ध में रहे कि चित्रों से वास्तविक पदार्थों के स्पर्श के सम्बन्ध में कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता, फिर भी इनका शिक्षण में विशेष लाभ होता है। वैसे भी चित्र प्राय: पदार्थों तथा नमूमों से लाभ होता है वैसे भी चित्र प्राय: पदार्थों तथा नमूनों से सस्ते होते है एवं बाजार में आसानी से मिल भी जाते हैं। ध्यान देने की बात है कि जब शिक्षक ज्ञान का वतरण करते समय चित्रों की सहायता लेता है तो बालकों का ध्यान पाठ की ओर लगा रहता है। इससे शिक्षक अपने उददेश्य को सरलतापूर्वक प्राप्त कर लेता है। अत: शिक्षक को छोटी कक्षाओं में तो चित्रों का प्रयोग9 अवरश्य करना चाहिए। स्मरण रहे कि यूँ तो चित्रों का प्रयोग प्राय: सभी स्तरों पर करना चाहिए परन्तु विशेष रूप से भूगोल, इतिहास, विज्ञानस भाषा तथा बागवानी एव प्रकृति निरीक्षण आदि विषयों के शिक्षण में अवश्य करना चाहिए।

CTET UPTET Study Material in PDF Download Hindi

  1. मानचित्र (Maps)मानचित्र का प्रयोग प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं तथा भौगोलिक तथ्यों अथवा स्थानों के अध्ययन करने के लिए परम आवश्यक है। यूँ तो मानचित्र बने-बनाए ही बाजार से मिल जाते है, पर अच्छा यही है कि शिक्षक मानचित्रों को स्वयं ही बनाए और उनमें केवल उन्ही बातों को सुन्दर ढ़ग से अंकित करें जिनकी नितान्त आवश्यकता हो। स्मरण रहे कि शिक्षक को मानचित्रों के ऊपर उनका नाम, शीर्षक, दिशा तथा संकेत आदि अवश्य लिकना चाहिए तथा उनवमें रंगों का प्रयोग कल्पना, अनुभव तथा कलात्मक भाव से करना चाहिए अन्यथा मानचित्र भद्दे भौंडे तथा व्यर्थ हो जाएगें।
  2. ग्राफ(Graph) ग्राफ का अपना निजी महत्व होता है। ग्राफ के प्रयोग से बालरकों को भूगोल, इतिहास, गणित तथा विज्ञान आदि अनेक विषयों का ज्ञान सरलतापूर्वक दिया जा सकता है। स्मरण रहे कि ग्राफ की सहायता से भूगोल के पाठ में जलवायु उपज तथा जनसंखया आदि का ज्ञान दिया जा सकता है तथा इतिहास के शिक्षण में इसका प्रयोग स्वतन्त्रता संग्राम की प्रगति का ज्ञान देने के लिए किया जाता है। ऐसे ही गणित तथा विज्ञान का शिक्षण करते समय भी ग्राफ का प्रयोग करते हुए अनेक प्रश्नों को हल किया जा सकता है अत: शिक्षक को विभिन्न विषयों का शिक्षण करते समय आवश्यकतानुसार ग्राफ स्वयं भी बनाने चाहिए तथा बालकों से भी बनवाने चाहिए।
  3. चार्ट (Charts) चार्टों के प्रयोग से शिक्षक को शिक्षण का उददेश्य प्राप्त करने में बड़ी सहायता मिलती है। ध्यान देने की बात है कि चार्टों का प्रयोग भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, नागरिकशास्त्र तथा गणित एवं विज्ञान आदि सभी विषयों में सफलतापूर्वक किया जा सकता है। अत: शिक्षक को पाठ की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए अधिक –से अधिक चार्ट स्वयं ही तैयार करके उचित ढ़ंग से प्रयोग करने चाहिए। स्मरण रहें कि चार्ट द्वारा प्रदर्शित की हुई विषय-वस्तु इतनी सुन्दर, सुडौल तथा मोटी होनी चाहिए कि कक्षा के प्रत्येक बालक का ध्यान उसकी और आकर्षित हो जाए और शिक्षक अपने प्रयोजन को सरलता से स्पष्ट कर सके।
  4. संग्रहालय (Museum) संग्रहालय भी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इसमें वस्तुओं को एकत्रित करके रखा जाता है। इन वस्तुओं की सहायता से पाठ रोचक तथा सजीव बन जाता है एवं बालक उसे सरलतापूर्वक समझ लेते हैं। अत: शिक्षक को संग्रहालय का सदुपयोग अवश्य करना चाहिए। शिक्षक द्वारा संग्रहालय में एकत्रित की हुई वस्तुओं का प्रयोग भूगोल, इतिहा, गणित तथा विज्ञान आदि विषयों के शिक्षण में सरलतापूर्वक किया जा सकता है। अत: शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों को स्कूल के संग्रहालय में विभिन्न प्रकार के डाक टिकट, सिकके, पुराने अस्त्र –शस्त्र तता कीड़े मकोड़े एवं यन्त्रों को एकत्रित करने के लिए प्रोत्साहित करे। इसे बिना कुछ व्यय किए ही स्कूल के संग्रहालय में नाना प्रकार की वस्तुएँ सहज में ही इकट्ठी हो जाएँगी।
  5. जादू की लालटेन ( Magic Lantern) जादू की लालटेन एक चित्र प्रदर्शक यन्त्र है। यह यन्त्र शिक्षण को सजीव एवं प्रभावशाली बनाने में इतना सफल सिद्ध हुआ है कि इसकी उपयोगिता को प्राय: सभी शिक्षा –शास्त्रियों ने स्वीकार किया है। स्मरण रहे कि जादू की लालटेन को प्रयोग में लाने के लिए स्लाइड़ो की आवश्यकता पड़ती है अत: यद बालकों को दिन में विभिन्न विरषखयों की शिक्षा देने के पश्चात् उन्ही के सम्बन्ध में रात्रि के स्लाइडें दिखा दी जाएँ तो उन्हे ज्ञान ग्रहण करने में आसानी हो जाएगी और वे उसे कभी नहीं भूलेगें। कहने का तात्पर्या यह है कि जादू की लालटेन अमूर्त तथ्यों तथा गूढ़ विचारों को बोधगम्य बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है।

CTET UPTET Study Material Question Papers in Hindi

  1. चित्र- विस्तारक यन्त्र चित्र –विस्तारक यन्त्र पाठ को अधक स्पष्ट तथा रोचक बनाने के लिए जादू की लालटेन की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली यन्त्र है। इसका कारण यह हे कि जादू की लालटेन मं चित्रों को दिखाने से पहले स्लिडें बनाने की आवश्यकता पड़ती है। यह बात चित्र- विस्तार यन्त्र के साथ मानचित्रों, पोस्टरों तथा पुस्तक पृष्ठों को कमरे में अन्धेरा करके चित्रपट अथवा पर्दे पर बिला स्लाइड़े बनाने की आवश्यकता पड़ती है। यह बात चित्र –विस्तार यन्त्र के साथ नहीं है। चित्र –विस्तारक यन्त्र में छोटे –छोटे चित्रों मानचित्रों पोस्टरों तथा पुस्तक के पृष्ठों को कमरें अन्धेरा करके चित्रपट अथवा पर्दे पर बिला स्लाइड़े बनाए हुए ही बड़ा करके दिखाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में जिन छोटे चित्रों को कलाकार भी विस्तृत रूप देने में असफल हो जाता है, उनको चित्र विस्तारक यन्त्र सरलतापूरर्वक दीर्घ रूप दे देता है। यही कारण है कि चित्र विस्तारक यन्त्र ने आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में नागरिकशास्त्र, अर्थशास्त्र इतिहास तथा भूगोल आदि सभी विषयों को पढ़ाने के लिए आपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। अमेरिका तथा इंग्लेण्ड आदि धनवास देशों के स्कूलों में पाठ को रोचक तथा स्पष्ट बनाने के लिए चित्र-विस्तारक यन्त्र का प्रयोग बहुत अधिक किया जाता है।
  2. मूक- चित्र (Soundless Motion Pictures) मूक –चित्र चलचित्र का पह्ला रूप है। इससे क्रियाएँ तो पूरी दिखाई जाती हैं परन्तु ध्वनि नहीं होती दूसरे शब्दों में मूक चित्र द्वारा विभिन्न विषयों तथा क्रियाओं जैसे सफाई के साध, विभिन्न विषयों तथा क्रियाओं जैसे सफाई के साधन, विभिन्न रोगों से बचने के उपाय तथा प्राकृतिक दृश्यों एवं वर्णनों को क्रिया रूप में आसानी से स्पष्ट किया जाता है। अत: चित्र विस्तारक यन्त्र तथा प्रक्षेपक यन्त्रों की अपेक्षा मूक चित्रों का शिक्षण में विशेष महत्व है।

More Latest News

Join Our CTET UPTET Latest News WhatsApp Group

Like Our Facebook Page

 
Posted in CTET Study Material, Govt. Jobs Tagged with: , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published.

About Me

Manoj Saxena is a Professional Blogger, Digital Marketing and SEO Trainer and Consultant.

How to Earn Money Online

Categories