CTET UPTET Shiksha Shastra Pedagogy Bhaasha Vikaas Shikshan Paddhati Study Material in Hindi

CTET UPTET Shiksha Shastra Pedagogy  Bhaasha Vikaas  Shikshan Paddhati Study Material in Hindi

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शिक्षा शास्त्र (Study Material in Hindi)

Pedagogy

भाषा विकास की शिक्षण पद्धति (CTET UPTET Study Material in PDF Download)

सीखना  और अधिग्रहण करना Learning & Acquiring

अपने व्यपकतम रूप से तो भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से हम सोचते है तथा अपने विचारों को व्यक्त करते है किन्तु भाषाविज्ञान में हम जिस भाषा का अध्ययन- विश्वेषण करते है, जो बोली और सुनी जाती है और बोलना भी पशु-पक्षियों का नही, गूँगे मनुष्यों का भी नहीं, केवल बोल सकने वाले मनुष्यों का है।प्रोक्तिविज्ञान तर्कपूर्ण, क्रमयुक्त और आपस में आन्तरिक रूप से सुसम्बद्ध, एकाधिक वाक्यों की ऐसी व्यवस्थित इकाई को प्रोक्ति कहते है जो सन्दर्भ- विशेष में अर्थद्दोतन की दृष्टि से पूर्ण हो। अर्थात्

  1. प्रोक्ति में एक से अधिक वाक्य होते है।
  2. इन वाक्यों का क्रम तर्कपूर्ण होता है.
  3. ये आन्तारिक रूप से आपस में सुसम्बद्ध होते हैं।
  4. ये वाक्य, आपस में मिलकर, सन्दर्भ-विशेष में अर्थ की दृष्टि से पूर्ण होते है।
  5. ये वाक्य तर्कपूर्ण क्रमयुक्तता, आपस में सुसम्बद्धता तथा अर्थद्दोतन की दृष्टि से पूर्णता के कारण एक इकाई के रूप में होते हैं।

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उपरोक्त परिभाषा में तर्कपूर्ण क्रमयुक्तता आन्तरिक रूप स आपस में एकाधिक व्यवस्थित तथा सन्दर्भ विशेष आदि को छोड़ा जा सकता है, क्योकि यदि वाक्य सुसम्बद्ध है, तो उनका क्रम तर्कपूर्ण सुसम्बद्ध वाक्यों पदबन्ध में एकाधिकता, तर्कपूर्ण क्रमयुक्त (बिना इसके सुसम्बद्धता) नहीं आ सकती आपस में सम्बद्धता तथा आन्तरिक सम्बद्धता स्वत: समाहित है और बिना व्यवस्थितता के वाक्यों की लड़ी की कड़ी तो हो सकती है, सच्चे अर्थो में इकाई नहीं बन सकती हैवाक्य विज्ञान वाक्य को साधरणत: लोग सार्थक शब्दो का समूह मानते है, जो भाव को व्यक्त करने की दृष्टि से अपने आप से पूरण हो। इस प्रकार पूर्ण अरथ प्रतीत करने वाले शब्दों के समूहों को वाक्य कहते हैं। भाषा की दृष्टि से वाक्य की प्रमुख विशेषाताएँ इस प्रकार हैं

  1. वाक्य भाषा की सहज इकाई है।
  2. वाक्य में एक शब्द (पद) भी हो सकता है और एक से अधिक भी।
  3. वाक्य में अर्थ की पूरणता हो सकती है और नहीं भी।
  4. वाक्य वयकारणिक दृष्टि से पूरण होता है।
  5. व्याकारिणिक पूर्णता कभी-कभी सन्दर्भ पर भी निर्भर करती है।
  6. वाक्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कम-से कम एक समापिका क्रिया का भाब अवश्य होता है।
  7. अर्थ विज्ञान किसी भी भाषिक इकाई (वाक्य, वाक्यांश रूप, शब्द, मुहावरा आदि) को किसी भी इन्द्रिय (प्रमुखत: कान, आँख) से ग्रहण करने पर जो मानसिक प्रतीति होती है वही अर्थ है। अर्थ की प्रतीति दो प्रकार से होती है
  8. आत्म- अनुभव तथा 2. पर-अनुभव
  9. आत्म-अनुभव स्वयं किसी चीज का अनुभव करके। उदाहरण के लिए चीची मीठी होती है में मीठी के अर्थ की प्रतीति स्वयं चीची चखने से हो जाती है पानी, गर्मी धूप के अर्थ की प्रतीति भी इसी प्रकार से हो सकती है।
  10. पर-अनुभव से अनेक क्षेत्र ऐसे भी होते है जहाँ हमारी पहुँच नहीं होती, उस क्षेत्र से सम्बद्ध शब्दादि के अर्थ की प्रतीति के लिए हमें दूसरों के अनुभव या ज्ञान पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहण के लिए, हममें से अनेक लोगों ने जहर नहीं देखा होगा, किन्तु दूसरों से ऐसा, सुन रखा है कि जहर जीव को मार डालने वाला पदार्थ होता है। अत: जहर शब्द के अर्थ की प्रतीति का मूलाधार आत्म अनुभव न होकर पर अनुभव है। ऐसे ही आत्मा, ईश्वर आदि अन्य अनेक प्राकर के शब्द हो सकते हैं।

अर्थ बोध के साधन भारतीय परम्परा में अर्थ बोध के आठ साधन माने गए हैं (CTET UPTET Practice Sets 2018)

  1. व्यवहार   शब्दकोश     3.   व्याकरण,     4.   प्रकरण,      5.      व्याख्या,     6.    उपमान,      7.     आप्तवाक्य,      8.      ज्ञान का सानिध्य।
  2. रूप विज्ञान रूप विज्ञान या पद विज्ञान में रूप या पद का विभिन्न दृष्टियों से अध्ययन किया जाता है। वर्णनात्मक रूप विज्ञान में किसी भाषा या बोली के किसी एक समय के रूप या पद का अध्ययन होता है, इतिहास में उसके विभिन्न कालों के रूपों का अध्ययन कर उसमें रूप –रचना का इतिहास या विकास प्रस्तुत किया जाता है, और तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।

सामान्य दृष्टि से देखने पर रूप –परिवर्तन और ध्वनि- परिवर्तन में अन्तर नहीं दिखाई देता परन्तु वास्तव में दोनो में अन्तर है। यद्दपि कभी –कभी ये दोनों इतने समान या समीप हो जाते हैं कि इनको अलग कर पाना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता हैं।

  1. शब्द विज्ञान शब्द विज्ञान शब्द का विज्ञान है। इसमें शब्द और उससे सम्बद्ध उन सारे अध्ययनों को रका जा सकता है जो भाषा विज्ञान की पारम्परिक शाखाओं –ध्वनि विज्ञान, रूप विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान में नहीं रखे जा सकते।

शब्द अर्थ के स्तर पर भाषा की लघुतम स्वतन्त्र इकाई है। इस परिभाषा में शब्द के सम्बन्ध में प्रमुखत दो बाते कही गी है जो उसकी विशिष्टता मान जा सकती है 1 यह अर्थ क स्तर की लघुतम इकाई है, अर्थात इसका क स्परष्ट अर्थ होता है ज अर्थ स्तर रपर लघुतम वाक्य , उपरवाक्य पदबन्ध तथा पद की तुलना होता है। यह ध्वनि भी हो सकती है और अधिक भी 2 यह इकाई स्वतन्त्र है, अर्थात प्रयोग में या अर्थ व्यक्त करने के लिए इसे किसी और की सहायता की आवश्यकता नही होती 1 (उपसर्ग) भी अर्थ क स्तर रपर लघुतम इकाई (नही) है और ता (प्रत्यय) भी (सुन्दरता ), किन्तु ये शब्द नही माने जा सकते  क्योकि अर्थ की लघुतम इकाई होते हुए भी इनका अकेले प्रयोग नही हो सकात इनके अर्थ की सेर्थकता किसी के साथ होने (अपूरणता पूर्णता ) पर ही है और उसी रूप में ये प्रयोग में आ सकते रहैं इस प्रकार तये परतन्त्र है। इसके विपरीत पूर्ण एक शब्द रहै, क्योकि इसमें उपरोक्त दोनों बातें है। यहब लघुतम ईकाई भी है और स्वतन्त्र (पूर्ण है) भी

  1. ध्वनि विज्ञान संस्कृत में ध्वनि विज्ञान का पुराना नाम शिक्षाशास्त्र ( Pedagogy) था। हिन्दी में इस प्रसंग में फोनिटिक्स के लिए मुख्यत: ध्वनि विज्ञान ध्वनि शास्त्र अथवा स्वन प्रक्रिया, स्वनप्रिक्रिया या स्वमिमविज्ञान का प्रयोग किया जा सकता है। ध्वनि विज्ञान के अन्तर्गत बाचन तथा श्रवण कौशलों का प्रयोग किया जाता है।
  2. लिपि विज्ञान भाषा अपने मूल रुप में ध्वनि पर आधारित है। ध्वनियाँ ही उच्च्रित रहोती रहै और सुनी जाती है। इस प्रकार भाषा की काल और स्थान की दृष्टि से सीमा है वह केवल तबी सुनी जा सकती है जहां तक आवाज जा सकती है। काल और स्थान की इस सीमा के बन्धन से भाषा को निकालने के ले लिपि का जन्म हुआ। निश्चय ही भाषा के विकासित हो जाने के बाद ही लिपि का विकास हुआ होगा।लिपि और भाषा के सम्बन्ध से यह र्थ है कि भाषा अपने मूल रुप में ध्वरनियों पर आधारित रहै, लिपि में उन ध्वनियों या कुछ भाषाओं में शब्दों )को रेखाओं द्वार व्यक्त करते है अर्थात दोनों में माध्यम का अन्तर है। लिपि विज्ञान के अन्तर्गत अक्षर बोध और उनके उच्चारण को महत्व दिया जाता है। अक्षरों का विभाजन स्वर और व्यंजनों के रूप में करते हैं।
 
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