CTET UPTET Shiksha Shastra Pedagogy bhaasha kaushal Language skillsStudy Material in Hindi

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भाषा कौशल Study Material in Hindi)

भाषा कोशल एक अभिव्यक्ति का साधन है जिसमें सुनने, बोलने, पढ़ने तथा लिखने का कौशल साम्मिलित होता है। किसी व्यक्ति की सम्प्रेषण की सक्षमता उसके भाषा कौशल की दक्षता पर निर्भर करती है। भाषा की प्रभावशीलता का सम्बन्ध उसकी बोधगम्यता से सम्बन्धित होता है।

भाषा कौशल की विशेषाताएँ

भाषा कौशल के विवेचन से विशेषाताओं एवं प्रकृति का बोध होता है। भाषा कौशल की सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं

कौशल भाषा का व्यावहारिक पक्ष है।

  1. भाषा कौशल सम्प्रेषण का साधन तथा मुख्य माध्यम है।
  2. भाषा कौशल सम्प्रेषण का साधन तथा मुख्य माध्यम है।
  3. भाषा कौशल में मानसिकस शारीरिक अंग, ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ क्रियाशील होती हैं।
  4. भाषा कौशल अर्जित किया जाता है, इसके लिए प्रशिक्षण तथा अभ्यास किया जाता है।
  5. भाषा कौशल में प्रत्यक्षीकरण तथा मानसिक व्यवस्था की भी आवश्यकता होती है।
  6. भाषा कोशल के दो घटक -1 पाठ्यवस्तु तथा 2 आभिव्यक्ति होते है। भाव –विचारों तथा उनका स्प्रेषण करना।
  7. भाषा कौशल के दो प्रवाह – 1लिखना –पढ़ना तथा 2 बोलना- सुनना है।
  8. भाषा कौशल का उददेश्य बोधगम्यता है।
  9. भाषा कौशल से सम्प्रेषण की सक्षमता का विकास होता है।
  10. भाषा कौशल से शाब्दिक अन्त: प्रिक्रिया होती है।
  11. भाषा कौशल की प्रभावशीलता का आकलन कौशलों की शुद्धता तथा बोधगम्यता से किया जाता है।
  12. भाषा कौशल का भाषा विज्ञान तथा व्याकरण ही मुख्य आधार होता है।

भाषा कौशल के विका3स हेतु उपयुक्त विधियाँ निम्नवत् हैं

  1. बोलने का कौशल (CTET UPTET Material in Hindi)

वाचन एक कला है। वाचन की जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यकता होती है। व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण उसकी सुसंस्कृत एवं मधुर वाणी है। क्योकि अन्य सभी आभूषण तो टूट या घिस जाते हैं, किन्तु वाणी सदा बनी रहती है। व्यक्ति का एकमात्र आभूषण उसकी मधुर वाणी है। अमृत भी मधूर वाणी में ही होता है। मनुष्य अपने भावों एवं विचारों को बोलकर अथवा लिखकर व्यक्त करता है। भावों एवं विचारों का समाप्रेषण या प्रकाशन ही रचना है। अत: रचना के दो मुख्य रूप हैं—मौखिक रचना एवं लिखित रचना। वशीकरण एक मान्त्र है—परिहर वचन कठोर।

कैथरीन ओकानर के अनुसार वाचन यह जटिल सीखने की प्रक्रिया है जिसमें सुननें के गतिवाही माध्यमों का मानसिक पक्षों से सम्बन्ध होता है।

भाषाओं के विश्लेषण से विदित होता है। कि उनके अक्षरों की ध्वनियाँ स्थानों पर विभिन्न प्रकार से निकलती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अक्षर ध्वनि परिस्थिति अनुसार बदल जाती है इसलिए इन भाषाओं के विद्वानों ने शुद्ध उच्चारण के लिए नियमों को प्रतिपादित किया है। परन्तु हिन्दी देवनागरी लिपि में ऐसा नहीं है, अक्षरों की ध्वनियाँ नहीं बदलती है। इसलिए हिन्दी के शिक्षकों को भाषा सिखाने अथवा वाचन के लिए अलग से आवश्यकता नहीं होती है। वाचन में शब्दों के उच्चारण का विशेष महत्व होता है। शब्दों का शुद्ध उच्चारण होना चाहिए।

भाषा शिक्षण वाचन एवं लिखने से आरम्भ किया जाता है। इस सम्बन्ध में सभी एक मत नहीं है। मॉण्टेसरी शिक्षा प्रणाली , लिखने से आरम्भ करने के पक्ष में है। परन्तु अन्य सभी वाचन से आरम्भ करने के पक्षधर है क्योकिं ध्वनि से ज्ञान सरल है। लिखने से बोलना सरल होता है। लिखने से ध्वरनि और लिपि के रूप को समझने में समय भी लगता है। लिपिबद्ध शब्दों को सरलता से पढ़ाया जा सकता है।

वाचन की विशेषताएँ सुन्दर वाचन में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है

  1. मधुरता, प्रभावोत्पादकता तथा चमत्कारपूर्ण ढ़ंग से उतार- चढ़ाव के साथ वाचन होना चाहिए।
  2. प्रत्येक अक्षर का शुद्ध तथा स्पष्ट उच्चारण करना।
  3. प्रत्येक शब्द को अन्य शब्दों से अलग करके उचित बल तथा विराम के साथ पढ़ना ।
  4. वाचन में सुन्दरता के साथ प्रवाह बनाए रखना।
  5. आवश्यकतानुसार उचित हाव –भाव का होना तथा समान गति से पढ़ना।
  6. पढ़ने का कौशल (Reading Skill)

लिखित भाष को पढ़ने की क्रिया को पठन कौशल कहा जाता है, जैसे –पुस्तकों को पढ़ना, समाचार-पत्रों को पढ़ना आदि। भाषा के सन्दर्भ में पढ़ने का अर्थ कुछ भिन्न होता है। भाव औ विचारों को, लिखित भाषा के माध्यम से अभिव्यक्ति को पढ़कर समझना पठन कहा जाता है। लिखने का उददेश्य होता है कि भाव और विचारों को हम दूसरों तक पहुँचाना चाहते है। अन्य व्यक्ति जब उसको लिखित भाषा के रुप में पढ़ेगा तब उसके भाव एवं विचारों को समझना पटन कहा जाता है। लिखने का उददेश्य होता है कि भाव और विचारों को हम दूसरों तक पहुँचाना चाहते हैं। अन्य व्यक्ति जब उसको लिखित भाषा के रूप में पढ़ेगा तब उसके भाव एवं विचारों को समझ लेगा। इस क्रिया को पठन कहते हैं। किस सीमा तक कोई व्यक्ति उसके भाव एवं विचारों को समझता है, यह उसकी एकाग्रता एवं ग्रहण शक्ति पर निर्भर करता है।

पठन दो प्रकार से किया जाता है—1. मौखिक रूप से पठन या बोलकर पढ़ना, 2. मौन रूप से पठन या मन ही मन पढ़ना। मौखिक रूप से पढने के भी कई रूप होते हैं—1. व्यक्तिगत पठन, 2. सामूहिक पठन, 3. आदर्श पठन, 4. अनुकरण पठन आदि।

पठन के आवश्यक कारक लिखित भाव एवं विचारों को मौखिक या मौन रूप में पढ़कर बोधगम्य करने में निम्नांकित कारक होते हैं

  1. पठन में दृश्य इन्द्रीय सामान्य तथा क्रियाशील होना।
  2. लिखित भाषा लिपि का ज्ञान होना।
  3. लिखित पाठ्य –सामग्री की शब्दावली का बोध एवं शुद्ध उच्चारण का अभ्यास होना।
  4. पठन में तत्परता, एकाग्रता एवं रुचि का होना।
  5. पठन में लिखित अभिव्यक्ति के साथ उसके अर्थ एवं भाव को समझने की क्षमता होना।
  6. वाक्यविज्ञान, रूपविज्ञान एवं अर्थविज्ञान का बोध होना।

पठन कौशल का विकास कौसल का सम्बन्ध क्रियात्मक पक्ष के विकास से होता है। इसलिए भाषा कौशलों के विकास के लिए अभ्यास तथा प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। छात्रों को पढ़ने के लिए अवसर दिए जाएँ और उन्हें ऐसा साहित्य उपलब्ध कराया जाए जो उनकी रुचि लेते हैं इसलिए उन्हें शिक्षाप्रद् कहानियाँ पढ़ने का अवसर दिया जाए। पढ़ने का निरन्तर अभ्यास कराया जाए जिससे उनमें पठन की आदत का विकास हो जाए। पठन के अभ्यास का कार्य घर एवं विद्दालय दोनों से आरम्भ किया जा सकता है। छात्रों की अवस्थानुकूल विभिन्न स्तरों पर उनकी आवश्यकता एवं इच्छाओं के अनुकूल पठन के लिए अवसर दिए जाएँ।

CTET UPTET Material in Hindi Practice Sets

रचना भावो, एवं विचारों की कलात्मक अभिव्यक्ति है। वह शब्दों को क्रम से लिपिबद्ध, सुव्यवस्थित करने की कला है। भावोंच एवं विचारों की यह कलात्मक अभिव्यक्ति जब लिखित रुप में होती है तब उस लेखन अथवा लिखित रचना कहते हैं। अभिव्यक्ति की दृष्टि से लेखन तथा वाचन परस्परपूर्वक होते हैं। वाचन से लिखन कठिन रहोता है। लेखन में वर्तनी का विशेष महत्व है जबकि वाचन में उच्चारण का महत्व होता है उच्चारण की शुद्धता आश्यक तत्व है और लेखन में अक्षरों का सुडौल होना और वर्तनी की शुद्धता आवश्यक तत्व है और लेखन में अक्षरों का सुडौल होना और वर्तनी की शुद्धता होनी चाहिए।

लेखन की कला स्थायी साहित्य का अंग है लेखन की विषयवस्तु साहित्य का क्षेत्र होता है और वाक्य लिखित भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होता है। लेखन में सोचने तथा चिन्तन के लिए अधिक समय मिलता है जबकि वाचन में बावभिव्यक्ति का सतत् प्रबाह बना रहता है सोचने का समय नहीं रहता। मानव जीवन में लेखन तता वाचन दोनों रूपों का महत्व है।

लेखन की अशुद्धियाँ पाठकों तथा आलोचकों की दृष्टियों से बच नहीं सकती है जबकि वाचन में इतना ध्यान नहीं जाता है। इस कारण लेखन में भाषा की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। पाठ्य –सामग्री, विषय –सामग्री भाषा व शैली के परिष्कार पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। लेखन में भाषा, शैली तथा विष्य –सामग्री आदि सभी दृष्टि से शुद्ध होनी चाहिए।

लेखन के माध्यम से साहित्य की विधाओं एवं शैली का निर्माण तथा विकास किया जाता है। साहितेय में स्थायीपन लेखन से आता है। लेखन से अभिव्यक्ति के अनेक रूप है—कहानी, नाटक, निबन्ध, कथाएँ, आत्मकथा, संवाद, संस्मरण, जीवनी, कविता, गद्द गीत, काव्य, आदि। छात्रों को शिक्षण द्वारा इन विधाओं एवं रूपो रसे अव8गगकत कराया जाता है। वाचन में भावात्मक पक्ष की प्रधिनता होती है जो लेखन द्वार सम्भव नहीं हो पाती । स्वर के उतार –चढ़ाव से शब्दों में शक्ति आती है जिससे उसे प्रोत्सहन मिलता जाता है।

  1. सुनने का कौशल (Listening Skill)

वाचन सुनने और सुनकर उसका अर्थ एवं भाव समझने की  क्रिया को सुनने का कौशल कहा जाता है। इस कौशल का सैद्धान्तिक पक्ष ध्वनि विज्ञान के अन्तर्गत दिया गया है। सामान्यत: कानों द्वारा उनकी अनुभूति तथा प्रत्यक्षीकरम को श्रवण कहते हैं। मौखिक भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त भाव एवं विचारों को सुनकर समझना ही श्रवण केशल है। भाषा के सन्दर्भ में अर्ध बोध एवं भाव की प्रतीति सुनने के आवशय्क तत्व होते हैं। इस प्रकार जब कोई  व्यक्ति हमारे सामने अपने भाव एवं विचार मौखिक भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है और हम उसे सुनकर यथा भाव एवं विचार समझने और ग्रहण करते हैं तो हमारी यह क्रिया सुनना अथवा श्रवण कहलाती है, यह बात दूसरी है कि हम यथा भाव एवं विचार किस सीमा तक समझते और ग्रहण करते है।

मूल्यांकन की प्रविधियाँ (CTET UPTET Previous Year Study Material Exam

मूल्यांकन की प्रक्रिया ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक उददेश्य की प्राप्ति के सम्बन्ध में प्रदत्त का संकलन करती है। परम्परागत परीक्षाओं से ज्ञानात्मक उददेश्यों का ही मापन किया जाता है। मूल्यांकन की प्रक्रिया का क्षेत्र अधिक व्यापक होता है। इसमें अनेक प्रकार की प्रविधियाँ प्रयुक्त की जाती है।

  1. ज्ञानात्मक उददेश्यों के लिए मौखिक, लिखित, निबन्धात्मक परीक्षाएँ तथा प्रयोगात्मक परीक्षाएँ उपयोग में लाई जाती हैं। निरीक्षण प्रविधि का भी प्रयोग करते हैं।
  2. भावात्मक उददेश्यों के लिए अभिरुचि सूची (Attitude Scale), रेटिंग स्केल तथा मूल्यों की परीक्षा (Values Test) आदि प्रयुक्त किए जाते हैं। निबन्धात्मक परीक्षाएँ भी आंशिक रूप से प्रयुक्त किए जाते हैं। निबन्धात्मक परीक्षाएँ भी आंशिक रूप स प्रयुक्त की जा सकती हैं।
  3. क्रियात्मक उददेश्यों के लिए प्रयोगात्मक परीक्षा अधिक उपयोगी मानी जीती है। इसमें छात्रों को छुछ क्रियाएँ करनी पड़ती हैं और उनके कौशल का मूल्यांकन किया जाता है।

मूल्यांकन में मानदण्ड परीक्षा को विशेष महत्व दिया जाता है। इसकी तीन प्रमुख विशेषताएँ होती हैं

  1. समुचितता (Appropriateness) मानदण्ड परीक्षा समुचित मानी जाती है क्योंकि इसमें उददेश्यों को विशेष महत्व दिया जाता है। परीक्षा के प्रश्न विशिष्ट उददेश्यों की प्राप्ति का मापन करते हैं।
  2. प्रभावशीलता (Effectiveness) मानदणड परीक्षा का प्रशासन सरल रहोना चहिए। अंकन भी सरल हो तथा शिक्षकों को मान्य होनी चाहिए।
  3. व्यावहारिकता (Practicability) मानदण्ड परीक्षा का प्रशासन सरल होना चाहिए। अंकन भी सरल हो तथा प्रदत्तो का अर्थापन सार्थक होना चाहिए। परीक्षा छात्रों तथा शिक्षकों को मान्य होनी चाहिए।

अभिक्रमित अनुदेशन के मूल्यांकन में प्रमुख रूप से मानदण्ड परीक्षा को प्रयुक्त किया जाता है। यदि मानदण्ड परीक्षा में छात्रों को अच्छे अंक (90/90 मानदण्ड) नहीं प्राप्त हुए तो यह इस बात का सूचक है कि अधिगम प्रक्रिया प्रभावशाली नहीं है। इसमें परिवर्तन तथा सुधार लाना चाहिए। इस प्रकार अनुदेशन अभिक्रमित की प्रभावशीलता के सम्बन्ध में निर्णय लिया जा सकता है। छात्रों की प्रतिक्रियाओं को एवं उनकी कमजोरियों को जानने के लिए भी मानदण्ड परीक्षा प्रयुक्त कर सकते हैं और उनमें सुधार ला सकते हैं।

मूल्यांकन प्रविधियोंका वर्गीकरण (CTET UPTET Online Study Material)

विद्दालयों में प्रयुक्त की जाने वाली सभी मूल्यांकन प्रविधियों को प्रमुख रूप से दो वर्गो में विभाजित किया जाता है

  1. परिमाणात्मक (Quantitative) प्रविधि तथा
  2. गुणात्मक (Qualiative) प्रविधि
  3. परिमाणत्मक परीक्षाएँ (Quantitative Test)

मूल्यांकन में इस प्रकार की प्रविधियाँ अधिक उपयोगी, विश्वसनीय तथा वैध होती है। ये तीन प्रकार की होती हैं

  • मौखिक परीक्षा
  • लिखित परीक्षा
  • प्रयोगात्मक परीक्षा

मौखिक –इसमें मौखिक प्रश्न, वाद-विवाद –प्रतियोगिता तथा नाटक आदि को प्रयुक्त किया जाता है।

लिखित (Written) इसमें प्रश्न लिखित रूप में पूछे जाते है, छात्रों को उनका उत्तर लिखना होता है। लिखित परीक्षाएँ दो प्रकार की होती हैं

 

2.गुणात्मक परीक्षाएँ (CTET UPTET Study Material PDF File Format)

विद्दालय में गुणात्मक परीक्षाओं का उपयोग आन्तरिक मूल्याकंन के लिए किया जाता है। ये साधारतणत: पाँच प्रकार की होती हैं

  1. संचयी आलेख (Cumulative Records )
  2. एनेकडोटल आलेख (Anecdotat Records)
  3. निरीक्षर(Observation)
  4. जाँच सूची (Check List)
  5. अनुपस्थिति मापनी (Rating Scale)

1 संचयी आलेख विद्दालयों में प्रत्येक छात्र के समबन्ध में सूचानाओं को क्रमबद्ध रूप में व्यवस्थित किया जाता है। इसमें शैक्षिक प्रगति, मासिक परीक्षा-फल, उपस्थिति, योग्यता तथा अन्य विद्दालयों की क्रियाओं में भाग लेने आदि का आलेख प्रस्तुत किया जाता है। छात्र की प्रगति तथा कमजोरियों को जानने के लिए अभिभावको, शिक्षकों तथा प्रधानाचार्य के लिए यह अधिक उपयोगी आलेख होता है।

  1. एनेकडोटल आलेख इसमें बालों के व्यवहार से सम्बन्धित महत्वपूर्ण घटनाओं तथा कार्यो का वर्णन किया जाता है। इन कार्यो तथा घटनाओं का आलेख सही रूप में किया जाता है। निरीक्षण करने वाले छात्र की रूचियों तथा झुकावों को उत्पन्न करने वाले घटकों का भी उल्लेख करता है, इलके आधार पर छात्र के सम्बन्ध में सामान्यीकरण किया जा सकता है और निर्देशन में इसे प्रयुक्त करते हैं।
  2. निरीक्षण इसका प्रयोग विशेष रूप से छोटे बालकों के मूल्यांकन के लिए किया जाता है, क्योकि उनको अन्य कोई परोक्षा नही दी जा सकती है और उनके व्यवहार में वास्तविकता होती है। इसका प्रयोग उनकी योग्यता तथा व्यवहारों के सम्बन्ध में किया जाता है। उच्च कक्षाओं में सामान्यीकरण किया जात सकता है और निर्देशन में इसे प्रयुक्त करते हैं।
  3. जाँच सूची लिखित तथा मौखिक परीक्षाएँ छात्रों के ज्ञानात्मक पक्ष की परीक्षा करती की जाँच करती है। जाँच सूची का प्रयोग अभिरुचियों , अभिवृत्तियों तथा भावात्मक पक्ष के लिए किया जाता है। इसमें कुछ कथन दिए जाते हैं। उन कथनों के सम्बन्ध में छात्रों को हाँ अथवा नहीं में उत्तर देना होता है। इस प्रकार के कथनों की सूची की रचना करते समय उददेश्य स्पष्ट चाहिए। प्रतेयक कथन को किसी विशिष्ट उददेश्य का मापन करना चाहिए। जैसे
  • आपको शिक्षण –सोपानों का स्मरण करने में रूचि है। हाँ/नहीं)
  • आप पाठ-योजना की रचना करने में रुचि लेते है। हाँ/नहीं
  • आपको कक्षा –शिक्षण के प्रस्तुतीकरण में आन्नद मिलता है। हाँ/नहीं
  • आपको छात्रों के कार्यो की प्रशंसा करना अच्छा लगता है। हाँ/नहीं

इस जाँच सूची से छात्राध्यापकों की शिक्षण मं रुचि का मूल्यांकन किया जा सकता है।

  1. अनुपस्थिति मापनी इसमें कुछ कथन दिए जाते है, उनका तीन पाँच, सात बिन्दुओं तक सापेक्ष निर्णय करना होता है। इसका प्रयोग उच्च कभाओं के छात्रों के लिए ही किया जा सकता है, क्योकि निर्णय लेने की शक्ति छोटी आयु के छात्रों में नही होती शिक्षक भी प्रत्येक छात्र के मापन के लिए इसका प्रयोग करता है, परन्तु शिक्षक को प्रत्येक छात्र से भली प्रकार परिचित होना चाहिए। अनुपस्थिति मापनी के कथन स्पष्ट तथा विशिष्ट व्यवहारों से सम्बन्धित होने चाहिए।
 
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