CTET UPTET Shelter house aavaas Study Material in Hindi

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आवास Shelter (CTET UPTET Shelter house aavaas Study Material in Hindi)

सभी जीव –जन्तुओं को रहने के लिए आवास की आवश्यकता होती है आवास की आवश्यकता जीव-जन्तुओं को मुख्य रूप से भरण –पोषण तथा सुरक्षा के लिए होती है सभी जन्तु अपने रहने एवं सुरक्षा के लिए कुछ न कुछ उपाय करते हैं। सभी जीव ऐसे स्थान पर रहना पसन्द करते हैं जहाँ वे स्वतन्त्रतापूर्वक रह सकें, उन्हे पर्याप्त मात्रा में भोजन मिल सके एवं जो उनके एवं उनके बच्चों के लिए सुरक्षित हो। ऐसै स्थानों को उन जीवों का आवास कहते हैं।

उदाहरण के लिए, तालाब एक आवास है तथा समुद्र तट भी एक अन्य आवास है। कुछ जीव तालाब में रहते हैं तो कुछ वन में फिर कुछ जीव समुद्र तट पर रहते हैं। पौधे भी एक विशेष पर्यावरण में ही अच्छी तरह पनपते हैं तथा अधिक दिनों तक जीवित रहते हैं। कमल जैसे कुछ पौधे जल में तथा कैक्टस जैसे कुछ पौधे रेगिस्तान में उगते हैं।

परिभाषा किसी जीव का वह परिवेश जिसमें वह रहता है, उसका आवास कहलाता है। अपने भोजन, वायु एवं अन्य आवश्यकताओं के लिए जीव अपने आवास पर निर्भर करता है। आवास का अर्थ है, वास स्थान (एक निवास)।

विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु जैसे –मनुष्य, घोड़ा, गाय, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, मेंढक एवं कॉकरोच आदि) एक ही आवास में संयुक्त रूप से भी रहते हैं।

आवास के प्रकार Type of housing

विभिन्न प्रकार के जीवों की आवश्यकताओं  एवं उनके परिवेश को ध्यान में रखते हुए आवास मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं

  1. स्थलीय आवास स्थल (जमीन) पर पाए जाने वाले पौधों एवं जन्तुओं के आवास को स्थालीय आवास कहते हैं। वन, घास के मैदान, मरुस्थल, तटीय एवं पर्वतीय क्षेत्र स्थलीय आवास के कुछ उदाहरण हैं।
  2. जलीय आवास जलाशय, दलदल, झील, नदियाँ एवं समुद्र, जहाँ पौधे एवं जन्तु जल में रहते हैं, ऐसे जीवों के आवास जलीय आवास कहलाते है।

किसी भी आवास (स्थलीय या जलीय) में पाए जाने वाले सभी जीव-जन्तु एवं पौधे जैव घटक हैं। चटटान, मिट्टी, वायु एवं जल आदि वस्तुएं आवास के अजैव घटक हैं।

स्थलीय आवासों के प्रकार (CTET UPTET Types of Terrestrial Housing Model Paper)

स्थलीय आवास मुख्यतया तीन प्रकार के होते हैं। जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

  1. मरूस्थल मरुस्थल में जव बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होता है। मरुसथल दिन में बहुत गर्ण तथा रात में ठण्डा होता है। मरुस्थल में रहने वाले जीव-जन्तु दिन में भूमि के अन्दर रहते हैं वं श्वसन के लिए आस-पास की वायु का उपयोग करते हैं। मरुस्थल के जीवों (जैसे, ऊँट) के पैर सामान्यत: लम्बे पाए जाते हैं जिससे उनका शरीर रेत की गर्मी से दूर रहता है। उनमें मूत्रोत्सर्जन की मात्रा बहुत कम होती है तथा मल शुष्क रहता है। उन्हें पसीना भी नहीं आता क्योंकि शरीर से जल का स्राव बहुत कम होता है। इसलिए मरुस्थलीय जीव जल के बिना भी अनेक दिनों तक जीवित रह सकते हैं।

मरुस्थलीय पौधे भी मरुस्थलीय जीवों की तरह की जल की बहुत कम मात्रा उत्सर्जित कहते हैं इन पौधों में पत्तियाँ बहुत छोटी होती हैं या अनुपस्थित रहती हैं। कुछ पौधों में पत्तियाँ काँटों की तरह होती हैं। इससे पत्तियों से जल की बहुत कम मात्रा उत्सर्जित होती है। इन पौधों का तना एक मोटी मोमी परत स ढका होता है, जिससे पौधों को जल संरक्षण में सहायता मिलती है। नागफनी और कैक्टस मरुस्थलीय पौधों के उदाहरण हैं।

  1. पर्वतीय स्थल ये आवास क्षेत्र सामान्यत: बहुत ठण्डे होते हैं और इनमें तेज हवाएँ चलती हैं। कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में हिमपात भी होता रहता है। पर्वतीय आवासों के वृक्ष शंक्वाकार होते हैं तथा इनकी शाखाएँ तिरछी होती हैं। इनमें से कुछ वृक्षों की पत्तियाँ सुई के आकार की होती है। इसमें वर्षा का जल एवं हिमपात आसानी से नीचे चला जाता है। पर्वतीय आवासों के वृक्षों की भाँति इस क्षेत्र के जीव भी वहाँ की परिस्थितियों के अनुकूलन बनाए रखते हैं इन जीवों की त्वचा मोटी होती है जो इनका ठण्ड से बचाव करती है। इन जीवों के खुर मजबूत और बड़े होते हैं जो ढालों पर दौड़ने में इनकी मदद करते हैं।
  2. घास स्थल घास स्थलों में पाए जाने वाले वृक्ष बड़े एवं घने होते हैं। यहाँ ग्रीष्म ऋतु में गर्म हवाएँ तथा शरद ऋतु में ठण्डी हवाएँ चलती हैं। इन क्षेत्रों में लगभग सभी मौसम एक निश्चित अवधि के दौरान आते –जाते रहते हां। इन मैदानों में पाए जाने वाले जीव प्राय: भूरे रंग के होते हैं और तीव्र गति से दौड़ने की क्षमता रखते हैं। इन क्षेत्रों के जीव-जन्तुओं एवं पौधों में और भी बहुत-सी विशिष्ट संरचनाएँ होती है, जो उन्हे उनके आवास में जीवित रहने य़ोग्य बनाती हैं।

जलीय आवासों के प्रकार (CTET UPTET Types of Aquaculture Sample Paper)

  1. समुद्र समुद्र में जन्तु तथा पौधे लवणीय जल (खारे पानी) में रहते हैं तथा साँस लेने के लिए जल में विलेय वायु आर्थात ऑक्सीजन गैस का उपयोग करते हैं। लगभग सभी जलीय जीवों की शारीरिक संरचना धारा-रेखीय होती है। इस प्रकार की आकृति होने के कारण उन्हे जल के अन्दर गति करने में सहायता करती है। इन जीवों की एक विशेष संरचना होती है जो इन्हें जल में रहने में सहायक होती है। जल में श्वास लेने के लिए इनमें गिल (क्लोम) होते हैं।
  2. तालाब एवं झील तालाबों एवं झीलों में पाए जाने वाले पौधों की जड़े जलाशय के नीचे मिटटी में स्थिर रहती है। इन पौधों की जड़े बहुत छोटी होती हैं इसलिए खनिज एवं पोषण तत्वों का अवशोषण तनों के माध्यम से होता है। इन पौठों का तना लम्बा, खोखला एवं हल्का होता है। कुछ जलीय पौधे जल में पूर्ण रूप से डूबे रहते हैं। इनकी पत्तियाँ संकरी एवं लम्बी रहती हैं। जलीय पौधों के तने स्पंजी होते हैं। उनके तनों में वायुकोष होते हैं ताकि वे पानी की ऊपरी सतह पर तैर सकें उनकी पत्तियाँ फटी होती है ताकि पानी के बहाव के कारण वे नष्ट न हों। जलीय पौधों की तरह जलीय जीवों का भी शरीर ऐसा होता है जो उन्हें तैरने में सहायता करता है। जलीय जीवों (जैसे-मछली) में जल से ऑक्सीजन ग्रहण करने के लिए गलफड़ा होता है।

विभिन्न जीव-जन्तु एवं पेड़ –पौधों के आवास (CTET UPTET Shelter house aavaas Study Material in Hindi)

जीव-जन्तु आवास
घोघा

मकड़ी

याक

हिरन

ऑक्टोपस

स्किवड

खरगोश

जलीय

स्थलीय

पर्वतीय

घास स्थल

जलीय

जलीय

घास स्थल

 

पेड़-पौधे आवास
शैवाल

कमलिनी

हाइड्रिला

खऱपतवार

कैक्टस

नागफनी

मॉस

फर्न

जलीय

जलीय

जलीय

जलीय एवं घास स्थल

मरुस्थल

मरुस्थल

जलीय

काँटेदार पौधे

 

आवास के घटक किसी आवास में पाई जाने वाली सभी वस्तुएँ, आवास की घटक हैं। आवास के घटक मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं

  1. जैव घटक जैव घटक के अन्तर्गत मनुष्य, पेड़-पौधे व जीव-जन्तुओं को सम्मिलित किया जाता है। ये सभी घटक किसी न किसी प्रकार परस्पर सम्बन्धित होते हैं। इन जीवों में परस्पर सम्बन्ध का मुख्य कारण भोजन है। भोजन प्राप्त करने के अनुसार जैविक घटकों को निम्न तीन भागों में विभक्त किया गया है
  • उत्पादक जैविक घटकों में सबसे महत्वपूर्ण वनस्पतियाँ हैं क्योकिं वनस्पतियाँ ही प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा स्वयं के लिए तथा अन्य जीवों के लिए भोजन के निर्माण करती हैं। इसलिचए इन्हें प्राथमिक उत्पादक या स्वपोषी उत्पादक कहा जाता है। सभी स्थलीय पौधे के साथ-साथ जलोदभिद् पौधे, शैवाल व सूक्ष्मदर्शी पौधे स्वपोषी के अन्तर्गत आते हैं।
  • उपभोक्ता ये घटक अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राथमिक उत्पादकों पर निर्भर करते हैं। इसलिए इन्हें परपोषी भी कहा जाता है। इन्हें तीन श्रेणियों में विभक्त किया जाता है, शाकाहारी, माँसाहारी और सर्वाहारी।
  • अपघटक उत्पादक और उपभोक्ता घटकोंके मरने पर या नष्ट हो जाने पर निम्न स्तर के जीवधारी (जैसे, बैक्टीरिया, कवक इत्यादि) मृत शरीर को अपघटित कर अपना भोजन प्राप्त करते हैं। ये मृत जीवें के कार्बनिक पदार्थों को सड़ा-गला कर पुन: सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल लेते हैं।
  1. अजैव घटक अजैव घटक तीन प्रकार के होते हैं
  • अकार्बनिक तत्व ऑक्सीजन, कार्बन डाइ- ऑक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, खनिज लवण इत्यादि।
  • अकार्बनिक पदार्थ प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट इत्यादि।
  • जलवायु जल, प्रकाश, तापक्रम, सूर्य का प्रकाश इत्यादि

आवास एवं अनुकूलन (CTET UPTET Housing and Adaptation Study Material)

विभिन्न प्रकार के आवासों में अलग-अलग प्रकार के जीव-जन्तु पाए जाते हैं। मछली जल में ही क्यों रहती है, ऊँट मरुस्थल में क्यों रहते है, मनुष्य जल में क्यों नहीं रहता है?

इत्यादि प्रश्नों  का कारण केवल अनुकूलन है। विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधों को जीवित रहने, वृद्धि करने आदि क्रियाओं में विभिन्न आवश्यकताएँ होती है। जिस स्थान पर इन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है, वह उसी स्थान के प्रति अनुकूलित हो जाते हैं तथा उसी स्थान को आवास बना लेते हैं। हमारे आस-पास पाए जाने वाले सजीवों की कुछ ऐसी संरचाएँ होती हैं जो उन्हें अपने परिवेश अर्थात आवास में रहने योग्य बनाती हैं जिसमें वे प्राय: पाए जाते हैं। जिन विशिष्ट संरचनाओं अथवा स्वभाव की उपस्थिति किसी पौधे अथवा जन्तु को उसके परिवेश में रहने के योग्य बनाती है, अनुकूलन कहते हैं।

विभिन्न प्रकार के जन्तु और पैड़-पौधे भिन्न परिवेश (आवास) के प्रति अलग रूप से अनुकूलित हो सकते हैं, लेकिन विपरीत परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन करने पर उनकी वृद्धि तथा जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

ऋतु-प्रवास (रैन बसेरा) Ritual migration (night shelter)

  • घने जंगलोंस गर्म एवं ठण्डे स्थानों से लोग आकर अस्थायी बस्तियों में आकर रहने लगते हैं। लोरगों के इस मौसमी आवागम को ऋतु आवास या रैन बसेरा कहते हैं।
  • अपने देश में कई स्थानों पर रैन बसेरा बनाए गए हैं जहाँ कड़ाके की सर्दी में बेघर लोग रात गुजार सकते हैं। कुछ रैन बसेरों में साफ-सुथरें बिस्तरों के साथ खाने का बी प्रबन्ध किया जाता है।

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