CTET UPTET Paathy-Pustak Arth Evan Paribhaasha Study Material in Hindi

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पाठ्य CTET UPTET Paathy-Pustak  Arth Evan Paribhaasha Study Material in Hindi

पाठ्य–पुस्तक मानव की एक महत्वपूर्ण रचना है। मनुष्य अपने अनुभावो, विचारों एवं अनुभूतियों का पुस्तक के रूप में संचय करता है। पाठ्य –पुस्तक ज्ञान संचय का साधन रहै जिसका लाभ नई पीढी को होता है। पुस्तकों के माध्यम से संचित ज्ञान संचय एवं संचार का साधन पुस्तक है। आज के तकनीकी एवं माध्यमों का विकास हो रहा रहै। टैप रिकॉर्डर, विडियों टेप, फ्लॉपी, माइक्रो फिल्म आदि का विकास हुआ है। जिसमें महापुरुषों को देखने एवं सुनने का अवसर भी मिलता है जबकि पुस्तक के माध्यम से पढ़ने को मिलता है।

हैरोलिकर के अनुसार पाठ्य –पुस्त ज्ञान अनुभवों भावनाओं. विचारों तथा प्रवृत्तियों व मूल्यों के संचय का साधन है।

पाठ्य –पुस्तकों की विशेषताएँ (CTET UPTET Study Material in Hindi)

पाठ्य-पुस्तकों की उपयोगिता के अनुसार उनमें निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए

  1. अनुभवों का उपयोग पाठ्य- पुरस्कके एक ऐसा माध्यम रही हैं जिनके द्वारा महापुरूषों के विचारों तथा विद्वानों के शोध कार्यों के निष्कर्षो का प्रचार एवं प्रसार किया जाता है। शिक्षक तथा छात्र उनके अनुभवों तथा ज्ञान का संचय पुस्तकों के माध्यम से किया जाता है और भावी नागरिकों को प्रदान किया जाता है।

किसी विषय का अनुभवी शिक्षक यदि पुस्तक लिखता है तो वह दो प्रकार के अनुभवों को सम्मिलित करता है। पाठ्य-वस्तु का प्रारूप उस स्तर के लिए कितना उपयुक्त है। और उसे किस रूप में प्रस्तुत किया जाए जिसे छात्र सुगमता से बोधगम्य कर सकें, ऐसी पुस्तकें उत्तर प्रकार की मानी जाती हैं।

  1. समय की बचत या मितव्ययिता मानव का जीवन –काल सीमित हैं और समय तीव्रता से व्यतीत होता है तथा परिवर्तित होता है। अत: ज्ञान प्राप्त करने की क्रियाएँ सरल एवं सुगम बनाने के ले पाठ्य-पुस्तुकों से समय की बचत होती है। मानवीय अनुभव तथा ज्ञान –राशि क्रमबद्ध तथा व्यवरस्थित रूप में पुस्तुकों में मिल जाती है, छात्र उनके अध्ययन से कम समय से अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
  2. सुनिश्चतता पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण विभिन्न स्तरों के लिए किया जाता है। किस स्तर पर कितना ज्ञान अथवा जानकारी छात्रों को प्रदान की जाए इसका बोध पाठ्य –पुस्तुकों से रहोता है। शिक्षक अपने शिक्षण की क्रियाओं का नियोजन करके उनका सम्पादन करता हैं। छात्रों के समुचित अधिगम परिस्थिति उत्पन्न करके अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन करता है।
  3. सुगमता शिक्षण अधिगम –क्रियाओं को व्यवस्थित और उनका संचालन करना सुगम हो, इसके लिए पाठ्य-पुस्तकों का विशेष महत्व होता है। प्रकरण के तत्वों को चढ़ाव के क्रम में व्यवस्थित किया जाता है। जो शिक्षक के लिए व्यवस्था की दृष्टि से और छात्रों के लिए सीखने की दृष्टि से सुगम है। गेने की अधिगम –परिस्थितियों के चढ़ाव के क्रम और उददेश्यों के चढ़ाव के क्रम के ध्यान रख कर पाठ्य- पुस्तकों का निर्माण किया गया है।

मल्टीमीडीया शिक्षण सहायक सामग्री के रूप में आजकल निम्नलिखित मल्टीमीडिया साधनों का प्रयोग किया जाता है (CTET UPTET Paathy-Pustak  Arth Evan Paribhaasha Study Material in Hindi)

  1. चल –चित्र अथवा सिनेमा चल –चित्र अथवा सिनेमा मूक –चित्र का दूसरा रूप है। इसमें मूक –चित्र की भाँति क्रियाएँ भी दिखाई जाती है, साथ ही ध्वनि की व्यवस्था भी होती है। इस प्रकार चल-चित्र अथवा सिनेमा बीसवीं शताब्दी की शिक्षा का सस्ता, सुलभ एवं यन्त्रीकृत महत्वपूर्ण साधन है। इसाका प्रयोग रेडियो और टेलीविजन के द्वारा अधिक प्रभाव शाली होता है तथा इसके अनेक लाभ हैं, जो निम्नलिखित हैं
    1. चल-चित्र द्वारा प्राप्त किया हुआ ज्ञान अन्य उपकरणों की अपेक्षा अधिक स्थायी होता है, क्योकि इसमें देखने तथा सुनने की इन्द्रियाँ सक्रिय रहती हैं।
    2. चल- चित्र औद्दोगिक तथ्यों तथा उनके प्रभावों एवं ऐतिहासिक घटनाओं और वैज्ञानिक अनुसन्धानों का साक्षात्कार करने में सहायक है।
  • चल- चित्र द्वारा बालकों को विभिन्न देशों की स्थितियों परिस्थितियों तथा मानव और उसके कार्य –कलापों का ज्ञान सरलतापूर्वक करा दिया जाता है।

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  1. चल-चित्र द्वारा बालकों की कल्पना –शक्ति को विकसित करके उनकी निरीक्षण शक्ति का विकास भी सरलतापूर्वक किया जा सकता है।
  2. चल-चित्र द्वारा सभी बालक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं नैतिक सभी प्रकार से विकसित होते हैं। संक्षेप में चल-चित्र द्वारा मन्द एवं तीव्र बुद्धि के सभी बालकों का जहाँ एक और मनोरंजन होता है वहाँ दूसरी और वे हर प्रकार की शिक्षा भी ग्रहण करते हैं। ध्यान देने की बात है कि मनोंरजन की दृष्टि से दिखाए जाने वाले चित्रों से शैक्षिक चित्र भिन्न होते हैं। मनोरंजन वाले चित्रों में कहानियाँ होती हैं परन्तु शैक्षिक चित्रों में भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, समाज-शास्त्र तथा विज्ञान आदि विषयों की सामग्री का समावेश होता है। दूसरे शब्दों में, चल- चित्र द्वारा सिनेमा में प्रयोग किए जाने वाले 35 मिमी के प्रोजेक्टर के स्थान पर स्कूल में केवल 16 मिमी के प्रोजेक्टर द्वारा बालकों को प्रत्येक विषय का ज्ञान सरलतापूर्वक दिया जा सकता है। हर्ष का विषय है कि भारत सरकार तथा उत्तर प्रदेश सरकार एव इंग्लैण्ड तथा अमेरिका के दूतावासों से शैक्षिक फिल्मे नि:शुल्क मिलती है, परन्तु खेद की बात है कि हमारे स्कूल आर्थिक कठिनाइयों के कारण हमारे बालक इस महत्वपूर्ण उपकरण के शैक्षिक लाभों से वंचित ही रह जाते हैं।

CTET UPTET Important Study Material in Hindi

  1. समाचार सम्बन्धी फिल्म (Documentary Filams) समाचार सम्बन्धी फिल्मों का तात्पर्य उन फिल्मों से है जिनके द्वारा बालकों को सामाजिक विषयों की शिक्षा दी जाती है। ऐसी फिल्मों द्वारा जनता को देश के राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक जीवन से सम्बन्धित परिस्थितियों, घटनाओं तथा योजनाओं तथा योजनाओं के सम्बन्ध में समाचार भी दिए जाते हैं। यही कारण है कि आजकल प्रत्येक देश में अधिक-से-अधिक समाचार सम्बन्धी फिल्में तैयार हो रही हैं ऐसी फिल्म स्कूलों में बालकों को तथा सार्वजनिक स्थानों पर जनता को दिखाई जाती हैं। इससे देश के प्रत्येक नागरिक को अपने देश के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण समाचार प्राप्त हो जाते हैं स्मरण रहे कि समाचार सम्बन्धी फिल्मों के द्वारा बालकों को सामाजिक शिक्षा के साथ –साथ नैतिक तथा धार्मिक शिक्षा भी बड़े सरल तथा रोचक ढ़ंग से दी जा सकती है। अत: इस प्रकार की फिल्मों द्वारा बालकों का जहाँ एक और मनोरंजन होता  वहीं दूसरी और उनके अनेक शैक्षिक लाभ भी हैं।
  2. दूरदर्शन (Television) टेलीविजन भी रेडियों की भाँति बिसवीं शताब्दी की वैज्ञानिक उपलब्धियों में शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। रेडियों द्वारा तो केवल वाणी ही सुन सकते हैं परन्तु टेलीविजन पर उन सबकी शक्लें तथा उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेते हुए भी देख सकते हैं। दूसरे शब्दों में टेलीविजन द्वारा बालकों के कान और आँख दोनों ही ज्ञानन्द्रियाँ सक्रिय होती हैं। इस दृष्टि से जो गुण चल-चित्र के हैं वही गुण टेलीविजन में भी है। यद्दपि टेलीविजन अभी शैशव अवस्था में है फइर भी इसके विषयों से पाठों को समय समय पर प्रसारित किया जाता है। आशा है कि रेडियो की भाँति टेलीविजन सेट भी इतने ही सस्ते हो जाएँगे कि हमारें स्कूलों के सभी बालक इसके द्वारा बात-चीत करना, भाषण देना तथा अभिनय आदि अनेक बातों को सरलता-पूर्वक सीख पाएँगे।
  3. रेडियों (Radio) रेडियो के जन्म की कहानी 1885 ई. से आरम्भ हुई है। आधुनिक जीवन में रेडियों का विकास इतना अधिक हो गया है कि अब यह हमारे लिए आवश्यकता की वस्तु बन गया है। रेजियो द्वारा दूर-दूर रहने वाले बालकों को एक ही साथ आधुनिकतम घटनाओं तथा नवीनतम सूचनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। इससे बालकों में नई-ऩई बातें सीखने की उत्सुकता उत्पन्न होती है। रेडियो द्वारा बालकों को उच्च कोटि के शिक्षा –शास्त्रियों से राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के विषय में अनेक वार्ताएँ तथा भाषाण सुनने को मिलते हैं। इससे उनमें राष्ट्रीयता की भावना का विकास होता है। साथ ही वे दैनिक जीवन की समस्याओं को समझने और सुलझाने के योग्य बन जाते है। रेडियों पर प्रसिद्ध कलाकारों तथा संगीतज्ञों के प्रोग्राम भी प्रसारित किए जाते हैं। इऩ प्रोग्रामों से उन्हें गाने और बजाने की शिक्षत्रा मिलती है। संक्षेप में रेडियों द्वारा बालकों को संसार के प्रत्येक राष्ट्र तथा उसमें निवास करने वाले सभी लोगों की क्रियाओं में रूचि उत्पन्न हो जाती है। इससे उनका सामान्य ज्ञान विस्तृत हो जाता है। संक्षेप में आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में रेडियों का विशेष महत्व है। इसीलिए लगभग सभी स्कूलों के पास अपने-अपने निजी रेडियों सेट हैं। आकाशवाणी द्वारा रेडियों पर प्रसारित होने वाले पाठों की विस्तृत सूचना समय से बहुत पहल उनके प्रकाशनों के साध्यम से दी जाती है। इन प्रकाशनों में कक्षा, प्रकारण के सम्बन्धन में संक्षिप्त सूचना, दिनांक और समय आदि दिए रहते हैं। शिक्षक को इन प्रकाशनों की निरन्तर जानकारी रखनी चाहिए तथा अपनी योजनानुसार प्रसारित पाठों का उपयोग करना चाहिए।
  4. ग्रामोफोन तथा लिंग्वोफोन ( Gramophone and Linguaphone) ग्रामोफोन तथा लिंग्वाफोन भी रेडियों की भाँति शिक्षण के महत्वपूर्ण उपकरण हैं। ग्रामोफोन द्वारा बालकों को भाषण तथा गाने की शिक्षा दी जाती है तथा लिंग्वाफोन द्वारा बालकों के उच्चारण शुद्ध कराकर भाषा की शिक्षा दी जाती है। अत: शिक्षक को उक्त दोनों उपकरणों का शिक्षण के समय आवश्यकता अनुसार प्रयोग करना चाहिए। ध्यान देने की बात यह है कि यद्दपि आधुनिक शिक्षा में ग्रामोफोन तथा लिंग्वोफोन का प्रयोग काफी बढ़ाता जा रहा है फिर भी ये दोनों उपकरण शिक्षण समय आवश्यकता अनुसार प्रयोग करना चाहिए। ध्यान देने की बात यह है कि यद्दपि आधुनिक शिक्षा में ग्रामोफोन तथा लिंग्वफोन का प्रयोग काफी बढ़ता जा रहा है फिर भी ये दोनों उपकरण शिक्षक का स्थान किसी भी दशा में नही ले सकते । ऐसी स्थिति में शिक्षक को चाहिए कि वह इन उपकरणों को प्रयोग करने के पश्चात् बालकों के सामने विषय का स्पष्टीकरण अवश्य कर दें। इससे वे ज्ञान को सफलातापूर्वक ग्रहण कर लेंगे।
  5. टेर- रिकॉर्डर (Tape-Recorder) शैक्षिक उपकरण के रूप में टेप-रिकॉर्डर एक नया उपकरण है। कोई भी व्यक्ति इसके अन्दर अपनी ध्वनि को किसी भी समय भर कर पुन: सन सकता है। इस दृष्टि से टेप-रिकॉर्डर का प्रयोग जहाँ क और महापुरुषों के प्रवचन, नेताओं के भाषण तथाप्रसिद्ध कलाकारों की कविताएँ एवं संगीत आदि के सुनाने में किया जाता है, वही दूसरी और बालक तथा शिक्षक भी इसमें अपनी ध्वनि को भरकर पुन: सुन सकते हैं। इससे उन्हबें बोलने की गति तथा स्वर प्रभाव सम्बन्धी सभी त्रुटियों एवं उच्चारणों को सुधारने मे आश्चर्यजनक सहायता मिलती हैं। चूँकि टेप रिकॉर्डर एक बहुमूल्य उपकरण है, इसलिए आर्थिक कठिनाइयों के कारण इस उपकरण का प्रयोग अभी भारतीय स्कूलों में बहुत कम हो रहा है
 
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