CTET UPTET Concept Scope of EVS Study Materials in Hindi

CTET UPTET Concept Scope of EVS Study Materials in Hindi

CTET UPTET Concept Scope of EVS Study Materials in Hindi

CTET UPTET Concept Scope of EVS Study Materials in Hindi

CTET UPTET Concept Scope of EVS Study Materials in Hindi

पर्यावरण अध्ययन की अवधारणा व क्षेत्र CTET UPTET Concept and Scope of EVS Study Material in Hindi

पर्यावरण का अर्थ Meaning of Environment

पर्यावरण से अभिप्राय वह वातावरण है जिसमें सम्पूर्ण जगत घिरा हुआ है। दूसरे शब्दों में, सम्पूर्ण पृथ्वी का जीवन एक आवरण से घिरा हुआ है जो इसे परिचालित भी करता है और स्वयं भी प्रभावित होता है।

शाब्दिक अर्थ में पर्यावरण शब्द अंग्रेजी के Environment शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। पर्यावण का अर्थ है वह बाह्रा आवरण जो हमें चारों और से घेरे हुए है। पर्यावरण से अभिप्राय उन सभी भौतिक दशाओं तथा तथ्यों से लिया जाता है जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है।

प्रकृति के जैव-अजैव, तत्वों के समुच्चय को पर्यावरण कहते हैं। भूमि, जल, वायु तथा जैविक प्राणी पशु –पक्षी, पेड़ –पौधे, मानव जैविक पर्यावण का निर्माण करते हैं।

भौतिक पर्यावण पर ही जैविक पर्यावरण निर्भर करता है तथा जैविक पर्यावरण भूतल पर प्राणी –मात्र का जीवन प्रदान करने के लिए खाद्दान्न सामग्री एवं अन्य वस्तुएं प्रदान करता है मानव वनस्पति तथा पशु-पक्षियों के बिना जीवित नहीं रह सकता। मानव शरीर की रचना भी इन्ही तत्वों से मिलकर हुई है तथा जीवन की समाप्ति पर शरीर इन्ही तत्वों में विलीन हो जाता है।

भोति पर्यावरण के इन तत्वों के कारण आर्थात सनतुलित पर्यावरण के कारण ही सौस –मण्डल में पृथ्वी मात्र एक जीवित ग्रह है। सौर –मण्डल में पृथ्वी ही ऐसा मुख्य ग्रह है जिसमें पर्यावरण के सभी घटक विद्दमान हैं जिनके कारण यहाँ जीवन सम्भव हुआ है। सौर मण्डल के अन्य ग्रहों पर जीनव के प्रमाण अभी तक नहीं मिल पाए हैं। पर्यावरण के ये सभी घटक एक –दूसरे को प्रभावित करते हैं जिससे इनका विकास होता रहता है। सभी प्राणी, वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव इसी पर्यावरण के अंग है और मानव इस पर्यावरण के इन्ही घटकों से मानव का पोषण होता है और सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

पर्यावरण की विशेषताएँ CTET UPTET Environmental features Study Materials in Hindi

पर्यावरण की प्रमुख विशेषताएँ

  1. व्यक्ति को जन्म से मृत्यु तक प्रभावित करने वाली सम्पूर्ण परिस्थितियों को पर्यावरण में सम्मिलित किया गया है।
  2. वंशानुक्रम के अतिरिक्त सभी घटकों, कारकों तथा परिस्थितियों को प्रभावित करने वाली शक्ति को पर्यावरण कहते हैं।
  3. जीवधारियों के विकास एवं उत्थान को प्रभावित करने वाले बाह्रा शक्तियों को पर्यावण कहा जाता है।
  4. इसके अन्तर्गत भौतिक में वायु, जल तथा भूमि और जैविक में पौधों, पशु-पक्षियों तथा मनुष्य को सम्मिलित किया गया है।
  5. जीवन तथा व्यवहार की प्रकृति को प्रभावित करने वाले भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, भावात्मक, आर्थिक तथा राजनैतिक शक्तियों को पर्यावरण का अंग माना जाता है।
  6. एक व्यक्ति विशिष्ट समय तथा स्थान पर जिन सम्पूर्ण परिस्थितियों से घिरा होता है उसे पर्यावरण की संज्ञा दी जाती है।
  7. पर्यावरण के अन्तर्गत भौतिक, रासायनिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, जैविक तथा सांस्कृतिक क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है।
  8. मानव की व्यवस्था, प्रबन्ध तथा संस्थाओं के वातावरण तथा गतिविधियों एवं कार्यों को भी सम्मिलित करते है।

पर्यावरण के प्रकार CTET UPTET Types of Environment Study Material in Hindi

मुख्य रूप से पर्यावरण को निम्न दो भागों में विभाजित किया गाय है

  • प्राकृतिक अथवा भौतिक पर्यावरण
  • सामाजिक अथवा सांस्कृतिक पर्यावरण
  1. प्राकृतिक अथवा भौतिक पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण में दो प्रकार के पर्यावण सम्मिलित हैं
  • जैविक पर्यावरण
  • अजैविक पर्यावण

प्राकृति पर्यावरण के चार प्रमुख अंग है, जिनका विवरण निम्न प्रकार है

  1. जीव-मण्डल
  2. स्थल-मण्डल
  3. वायुमण्डल
  4. जल-मण्डल

1.जीव-मण्डल हमारे चारों और जीवित जगत है उसे हम जीव-मण्डल कहते हैं। इसे आध्ययन की सुविधा के लिए दो भागों में विभक्त कर सकते है

  • प्राणी –मण्डल तथा
  • वनस्पति-मण्डल प्राणी –मण्डल में हम सभी प्रकार के पशु पक्षियों तथा मनुष्यों को सम्मिलित करते हैं। वनस्पति –मण्डल में सभी प्रकार की छोटी –बड़ी वनस्पतियों को सम्मिलित करते हैं। वैज्ञानिंकों के अनुसार, सम्पूर्ण विश्व में करीब दस लाख प्रकार के प्राणी तथा तीन लाख प्रकार की वनस्पति पाई जाती हैं। ये सब भौतिक तथा प्राकृतिक पर्यावरण के प्रमुख अंग का निर्माण करते हैं।
  1. स्थल-मण्डल धरातल का अधिकांश क्षेत्र महासागरों से ढका है। जलीय क्षेत्र धरातल के लगभग 71% पर विस्तृत है। जल तल से ऊँचा उछा हुआ भाग स्थल मण्डल है इरसमें धरातल का लगभग 29% भाग आता है इस स्थल मण्डल में तीन परतें हैं। पहली परत भू-पृष्ट की है तथा धरातल स इस परत की गहराई 100 किमी है। इस परत में विभिन्न प्रकार की मिटिटयाँ और शैलें समाई हुई है। इस भाग का औसत घनत्व 2.7 है। दूसरी परत को उपाचय –मण्डल के नीचे 200 किमी तक है तथा इसका औसत घनत्व 3.5 आँका गया है। तीसरी परत को परिमाण –मण्डल कहते हैं, जो पृथ्वी का केन्द्रीय –मण्डल है और कठोर धातुओं से बना हुआ है, जिनमें निकल एवं लोहे की अधिकता है तथा इसका औसत घनत्व 3.9 आँका गया है। मानव के अधिकांश कार्यकलाप स्थल- मण्डल की ऊपरी सतह तक ही सीमित है। अभी स्थल –मण्डल की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना सम्भव नहीं हो सका है।
  2. वायुमण्डल पृथ्वी के चारों और हवा का एक मोटा आवरण है, जिसे वायुमण्डल कहते है, पृथ्वी की गुरूत्वात्कर्षण शक्ति के कारण वायु का यह घेरा पृथ्वी को जकड़े हुए है तथा धरातल से इसकी ऊँचाई साधारणत: 800 किमी मानी जाती है, वायुमण्डल में भी अनेक परते होती हैं, जिनमें –1 परिवर्तन-मण्डल, 2. क्षोभ –मण्डल, 3. समताप –मण्डल, 4. ओजोन- मण्डल, 5. आयन-मण्डल, 6. बाह्रामण्डल मुख्य है।

वायुमण्डल का 99% भाग नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन गैसों का बना है और क प्रतिशत में अन्य सभी गैसें –कार्बन डाइ- ऑक्साइड, आर्गन, हाइड्रोजन, निओन, हीलियम, ओजोन, क्रिप्टान, जिनोन आदि हैं। भारी गैंसे वायुमण्डल में जलवाष्प तथा धूलकण भी विद्दमान रहते हैं। वायु अदृश्य होती है, लेकिन इसमें भार होता है। इसलिए धरातल के समीप वाली वायु दबाव डालती है, जिसके कारम धरातल के समीप वायु का घनत्व अधिक पाया जाता है तथा ज्यों-ज्यों धरातल से ऊपर उठते है, वायु का घनत्व कम होता जाता है।

  1. जल-मण्डल पृथ्वी के समस्त जलीय भाग को जल-मण्डल कहते हैं जिसमें सागर तथा महासागर शामिल हैं। भूपटल के 71% भाग पर जल तथा 29% भाग पर थल का विस्तार है। यद्दपि यह सभी सहासागर के रूप में है, लेकिन इन्हें प्रशान्त महासागर, अन्ध महासागर, हिन्दी महासागर और आर्कटिक नामक चार भागों में बाँटा जाता है।
  2. प्रशान्त महासागर सबसे बड़ा तथा आर्कटिक सबसे छोटा है। जलमण्डल ने मानव को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बहुत प्रभावित किया है। महासागर ही थल भाग पर व्रषा के मुख्य स्त्रोत है और इसमें मछली, मोती, नमक और अन्य उपयोगी पदार्थ पाए जाते हैं तथा व्यापाक पैमाने पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार होता है।
  3. सामाजिक अथवा सांस्कृतिक पर्यावरण सांस्कृतिक पर्यावरण मानव द्वारा निर्मित भूदृश्य होता है जिनमें मानवीय निवास-गृह, आवागमन के साधन, सिचाई के साधन, परिवहन और संचार के साधन, आर्थिक क्रिया-कलाप, श्रम-विभाजन, खेत, मिल तथा कारखाने बैंक बीमा संस्थान, साहित्यिक, वानिक एवं राजनीतिक संस्थाएँ आदि शामिल हैं। मानव एक क्रियाशील इकाई है, मानव प्राकृतिक पर्यावरण के प्रत्येक क्षेत्र का केन्द्र बिन्दु है। मानव प्राकृतिक पर्यावरण के तत्वों से भी प्रभावित हो नहीं होता, लेकिन अपनी शक्तियों और क्रिया –कलापों से प्राकृतिक पर्यावरण के तत्वों से भी प्रभावित ही नहीं होता, लेकिन अपनी शक्तियों, प्रक्रियाओं के पर्यावरण के तत्वों को प्रभावित, नियन्त्रित तथा परिवर्तित भी करता है। इसलिए मानव अपनी शक्तियों और क्रिया- कलापों से प्राकृतिक पर्यावरण में परिवर्तन कर जिस नवीन पर्यावरण का निर्माण करता है उस सांस्कृतिक पर्यावरण अथवा मानव –निर्मात पर्यावरण कहते हैं। इस प्रकार मानव एक ऐसा केन्द्रीय कारक है, जो प्राकृतिक पर्यावण के तत्वों के प्रभावित होता हैं और पुन: अपनी शक्तियों तथा से प्रभावित होता है और पुन: अपनी शक्तियों तथा क्रियाओं से अधिकाधिक लाभ हेतु प्राकृतिक पर्यावरम में परिवर्तन कर उस अपने अनुकूल बनाता है।

More CTET UPTET Study material in Hinde

Join Our CTET UPTET Latest News WhatsApp Group

Like Our Facebook Page

 
Posted in CTET, CTET Study Material, UPTET, UPTET Latest News Tagged with: , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published.

About Me

Manoj Saxena is a Professional Blogger, Digital Marketing and SEO Trainer and Consultant.

How to Earn Money Online

Categories