CTET UPTET Concept of Child Centered Progressive Education Study Material in Hindi

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CTET UPTET Concept of Child Centered Progressive Education Study Material in Hindi : बालकेन्द्रित एवं प्रगतिशील शिक्षा की अवधारणा (Concept of Child-Centered and Progressive Education)

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CTET UPTET 2018 Exam Study Material बालकेन्द्रित शिक्षा 

प्राचीनकाल में शिक्षा का उद्देश्य बालको के मस्तिष्क में मात्र कुछ जानकारियाँ भरना होता था: किन्तु आधुनिक शिक्षा शास्त्र में बालको के सर्वांगीण विकास जोर दिया जाता है, जिसके लिए बाल मनोविज्ञान की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है | इसलिए वर्तमान समय में बालको के सर्वांगीण विकास के महत्त्व को समझते हुए शिक्षको के लिए बाल मनोविज्ञान की पर्याप्त जानकारी आवश्यक होती है | इस जानकारी के अभाव में शिक्षक न तो शिक्षा को अधिक से अधिक आकर्षण और सुगम बना सकता है और न ही वह बालको की विभिन्न प्रकार की समस्याओ का समाधान कर सकता है | इस प्रकार बालको के
मनोविज्ञान को समझते हुए उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था करने की आधुनिक शिक्षा प्रणाली बाल्केंद्रित शिक्षा कहलाती है | भारतीय शिक्षाविद गिंजू भाई की बाल बाल-केन्द्रित शिक्षा के क्षेत्र में विशेष एवं उल्लखनीय भूमिका रही है |

बालकेन्द्रित शिक्षा के बारे में समझाने एवं इसे क्रियान्वित रूप देने के लिए उन्होंने इससे सम्बन्धित कई प्रकार की पुस्तको की रचना की तथा कुछ पत्रिकाओ का भी प्रकाशन किया | उनका साहित्य बाल-मनोविज्ञान, शिक्षाशास्त्र एवं  किशोर-साहित्य से सम्बन्धित है | आज की शिक्षा पद्धति बाल-केन्द्रित है | इसमें प्रत्येक बालक की और अलग से ध्यान दिया जाता है | पिछड़े हुए और मन्द बुद्धि तथा प्रतिभाशाली बालको के लिए शिक्षा का विशेष पाठ्यक्रम देने का प्रयास किया जाता है | व्यवहारिक मनोविज्ञान ने व्यक्तियों की परस्पर विभिन्नताओ पर प्रकाश डाला है, जिससे यह सम्भव हो सका है की शिक्षक हर एक विधार्थी की विशेषताओ पर ध्यान दे और उसके लिए प्रबन्ध करे | आज के शिक्षक को केवल शिक्षा एवं शिक्षा पद्धति के बारे में नही, बल्कि शिक्षार्थी के बारे में भी जानना होता है, क्योकि आधुनिक शिक्षा विषय प्रधान या अध्यापक प्रधान न होकर्र बालकेन्द्रित है | इसमें इस बात का महत्त्व नही की शिक्षक कितना ज्ञानी, आकर्षक और गुणयुक्त है, बल्कि इस बात का महत्त्व है की वह बालक के व्यक्तित्व का कहाँ तक विकास कर पाता है |

CTET UPTET UP Teacher Exam Study Material बालकेन्द्रित शिक्षा की विशेषताएँ

बालको को समझना :- किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए शिक्षक को बालको के मनोविज्ञान की जानकारी अवश्य होनी चाहिये | इसके अभाव में वह बालको की न तो विभिन्न प्रकार की समस्याओ को समझ सकता है और न ही उनकी विशेषताओ को, जिसके परिणामस्वरूप बालको पर शिक्षक के विभिन्न प्रकार के व्यवहारों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है | बालको के सम्बन्ध में शिक्षक को उसके व्यवहार के मूल आधारों, आवश्यकताओ, मानसिक स्तर, रुचियों योग्यताओ, व्यक्तित्व इत्यादि का विस्तृत ज्ञान होना चाहिये | व्यवहार के मूल आधारों का ज्ञान तो सबसे अधिक आवश्यक है, क्योकि शिक्षा का उद्देश्य ही
बालक के व्यवहार को परिमार्जित करना है | अत: शिक्षा बालक की मूल प्रवृत्तियों, प्रेरणाओ उअर संवेगों पर आधारित होनी चाहिये |व्यवहार के इन मूल आधारों को नई दिशा में मोड़ा जा सकता है, इसका शोधन किया जा सकता है, इनको बलको में से निकाला जा सकता है | इसलिए सफल शिक्षक इनके शोधिकरण का प्रयास करता है |

बालक जो कुछ सीखता है, उससे उसकी आवश्यकताओ का बड़ा निकट सम्बन्ध है | स्कूल में पिछड़े हुए और समस्याग्रस्त बालको में से अधिकतर ऐसे होते है, जिनकी आवश्यकताएँ स्कूल में पूरी नही होती | इसलिए वे सडको पर लगे बिजली के बल्बों को फोड़ते है, स्कूल से भाग जाते है, आवारागर्दी करते है और आस-पडोस के लोगो को तंग करते तथा मोहल्ले के बच्चो को पिटते है | मनोविज्ञान के ज्ञान के अभाव में शिक्षक मार-पीट के द्वारा इन दोषों को दूर करने का प्रयास करता है, परन्तु बालको को समझने वाला शिक्षक यह जानता है की इन दोषी का मूल उनकी शरीरिक, सामाजिक अथवा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओ में ही कहीं न कहीं है | बाल मनोविज्ञान शिक्षक को बालको के व्यक्तिगत भेदों से परिचित करता है और यह बतलाता है की उनमे रूचि स्वभाव तथा बुद्धि आदि की द्रष्टि से भिन्नता पाई जाती है | अत: कुशल शिक्षक मन्द बुद्धि, सामन्य बुद्धि तथा कुशाग्र बुद्धि बालको में भेद करके उन्हें उनकी योग्यताओ के अनुसार शिक्षा देता है | शिक्षा देने में शिक्षक को बालक और समाज की आवश्यकताओ में समन्वय करना होता है | स्पष्ट है की इसके लिए उसे बालक की पूर्ण मनोवैज्ञानिक जानकारी होनी चाहिये |

शिक्षक विधि :- शिक्षाशास्त्र शिक्षक को यह बतलाता है की बालको को क्या पढ़ाया जाए, परन्तु असली समस्या यह है की कैसे पढ़ाया जाए ? इस समस्या को सुलझाने में बाल मनोविज्ञान शिक्षक की सहायता करता है | बाल मनोविज्ञान सीखने की प्रक्रिया, विधियों, महत्त्वपूर्ण कारको, लाभदायक और हानिकरक
दशाओ, रूकावटो, सीखने का वक्र तथा प्रशिक्षण संक्रमण आदि विभिन्न तत्वों से परिचित कराता है | इनके ज्ञान से शिक्षक बालको को सीखने में सहायता कर सकता है | शिक्षा, मनोविज्ञान शिक्षण की विधियों का भी मनोवैज्ञानिक विशलेषण करता है और उनमे सुधार के उपाय बतलाता है | बाल-केन्द्रित शिक्षा में शिक्षण विधि को प्रयोग में लाते समय बाल-मनोविज्ञान को ही आधार बनाया जाता है |

मुल्यांकन और परिक्षण :- शिक्षण से ही शिक्षक की समस्या हल नही हो जाती | उसे बालको के ज्ञान और विकास का मुल्यांकन और परिक्षण करना होता है | मुल्यांकन से परीक्षार्थी की उन्नति का पता चलता है | शिक्षा की प्रक्रिया में शिक्षक और शिक्षार्थी बार-बार यह जानना चाहते है की उन्होंने कितनी प्रगति
हासिल की है और यदि उन्हें सफलता अथवा असफलता मिली है तो क्यों और उसमे क्या परिवर्तन किये जा सकते है | इस सभी प्रश्नों के सुलझाने में मुल्यांकन के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के परीक्षणों और मापों की आवश्यकता पडती है | मुल्यांकन अन्य लोग भी करते है और व्यक्ति स्वयं भी करते है |
जहाँ शिक्षक स्वयं विधार्थी का मुल्यांकन करता है, वहाँ उसे यह सीखने में भी सहायता करता है की वह स्वयं अपनी प्रगति का निष्पक्ष रूप से मुल्यांकन कर सके | मुल्यांकन से प्रेरणाओ पर बड़ा प्रभाव पड़ता है और इसलिए उसका व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है | सभी प्रकार की मुल्यांकन विधियाँ मनोवैज्ञानिक तथ्यों
पर आधारित होती है | बाल मनोविज्ञान से शिक्षक को किसी शिक्षण परिस्थिति में बालक के मुल्यांकन से ही सहायता नही मिलती, बल्कि शिक्षक के रूप में अपनी योग्यता का भी पता चलता है | इस तरह बालकेन्द्रित शिक्षा में बालक के मुल्यांकन के लिए बाल-मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है |

पाठ्यक्रम :- समाज और व्यक्ति की आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए स्कूल के पाठ्यक्रम का विकास, व्यक्तिगत विभिन्नताओ, प्रेरणाओ, मूल्यों एवं सीखने के सिद्धान्तों के मनोवैज्ञानिक ज्ञान के, आधार पर किया जाना चाहिये | पाठ्यक्रम बनाने में शिक्षक यह ध्यान रखता है की शिक्षार्थी और समाज की क्या आवश्यकताएँ है और सीखने की कौन-सी क्रियाओ से ये आवश्यकताएँ सर्वोत्तम रूप से पूर्ण हो सकती है | भिन्न-भिन्न परिस्तिथियो में तथा विभिन्न स्तरों पर कुछ सीखने की क्रियाएँ वांछनीय हो सकती है और कुछ अवांछनीय, यह निश्चित करने में शिक्षक को विकास की विभिन्न स्थितियों का मनोवैज्ञानिक ज्ञान होना चाहिये | इस तरह बालकेन्द्रित शिक्षा में इस बात पर जोर दिया जाता है की क्रियात्मक होने के लिए प्रत्येक पाठ्यक्रम एक समुचित मनोवैज्ञानिक आधार पर स्थापित हो |

मानव सम्बन्ध :- बाल मनोविज्ञान ने शिक्षक को मानव सम्बन्धो को समझाने में सहायता दी है | शिक्षा और सीखने में सामूहिक एवं परस्पर सम्बन्धो का अवसर आता है | आधुनिक शिक्षा मनोविज्ञान इन सम्बन्धो के विषय में अनुसन्धान करता है और कक्षा में नेता के रूप में शिक्षक को अपना कार्य करने में
सहायता देता है | शिक्षा की प्रक्रिया में शिक्षक-शिक्षार्थी सम्बन्ध सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारक है | स्कूल में पहुँचकर बालक के सम्मुख शिक्षक उसके माता-पिता की स्थान ले लेते है | प्रत्येक बालक अपने समाने शिक्षक का एक आदर्श रखता है | दूसरी और शिक्षक भी यह सोचता है की आदर्श शिक्षक कैसा
होना चाहिए | शिक्षक सम्बन्धी विधार्थियों और शिक्षको को इन आदर्शो की परस्पर अन्त: क्रिया से कक्षा का व्यवस्थापन निर्धारित होता है | शिक्षा मनोविज्ञान से शिक्षक विधार्थी सम्बन्धो को बेहतर बनाने में सहायता मिलती है और सीखने के संवेगात्मक पहलुओ तथा सम्बन्धो के महत्व का पता चलता है | कक्षा का वातावरण जहाँ एक और शिक्षक शिक्षार्थी के परस्पर सम्बन्धो से भी बनता है |

व्यवस्थापन एवं अनुशासन :- बालकेंद्रित शिक्षा के अन्तर्गत कक्षा व विधालय में अनुशासन एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाल-मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है | उदाहरण के लिए कभी-कभी कुछ शरारती बालको में अच्छे समायोजक के लक्षण दिखाई देते है, ऐसी परिस्थिति में शिक्षको को उन्हें दबाने के स्थान पर प्रोत्साहित करने के बारे में सोचना पड़ता है | बाल-मनोविज्ञान ही शिक्षक को बतलाता है की एक ही व्यवहार भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रेरणाओ का कारण हो सकता है | शिक्षक को उनके असली प्रेरक कारणों का पता लगाकर उनके अनुकूल व्यवहार करना होता है |

प्रयोग एवं अनुसन्धान :- बालकेन्द्रित शिक्षा में बालको को प्रयोग एवं अनुसन्धान की और उन्मुख करने के लिए भी बाल-मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है | नई-नई परिस्थितियो में नई-नई समस्याओ को सुलझाने के लिए शिक्षक को स्वयं प्रयोग करते रहना चाहिए और उससे निकले निष्कर्षो का उपयोग करना
चाहिये | मनोविज्ञान के क्षेत्र में होने वाले नए-नए अनुसन्धानो से जो नए-नए तथ्य प्रकाश में आते है, उसकी जाँच करने के लिए भी शिक्षक को प्रयोग करने की आवश्यकता है |

कक्षा की समस्याओ का निदान और निराकरण :- बालकेन्द्रित शिक्षा के अन्तर्गत कक्षा की विभिन्न प्रकार की समस्याओ को पहचानने एवं उनका निराकरण करने के लिए भी बाल-मनोविज्ञान का ही सहारा लिया जाता है |

CTET UPTET 2017 2018 UP Primary Paper 1 Exam Study Material in Hindi प्रगतिशील शिक्षा

प्रगतिशील शिक्षा पारस्परिक शिक्षा की प्रतिक्रिया का परिणाम है | प्रगतिशील शिक्षा की अवधारणा के विकास में जॉन डीवी का विशेष योगदान है | जॉन डीवी संयुक्त राज्य अमेरिका के एक मनोवैज्ञानिक थे | प्रगतिशील शिक्षा की अवधारणा इस प्रकार है शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य बालक की शक्तियों का विकास है | वैयक्तिक विभिन्नता के अनुरूप शिक्षण प्रक्रिया में भी अन्तर रखकर इस उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है |

मस्तिष्क एवं बुद्धि :- मस्तिष्क एवं बुद्धि मनुष्य की उन क्रियाओ के परिणाम है जिन्हें वह जीवन की विभिन्न व्यावहारिक व सामाजिक समस्याओ को सुलझाने के लिए करता है | ज्यो-ज्यो वह जीवन की दैनिक की दैनिक क्रियाओ को करने में मानसिक शक्तियों का प्रयोग करता जाता है, त्यों-त्यों उसका विकास भी होता जाता | मस्तिष्क ही वह सबसे प्रमुख साधन है, जिसकी सहायता से मनुष्य अपनी समस्याओ का हल करता है | एक साधन के रूप में मस्तिष्क के तीन प्रमुख रूप है-चिन्तन, अनुभूति एवं संकल्प |

ज्ञान :- ज्ञान कर्म का ही परिणाम है | कर्म अनुभव से पूर्व आता है | अनुभव ज्ञान का स्त्रोत है | जिस प्रकार बालक अनुभव से यह समझता है की अग्नि हाथ जला देती है, उसी प्रकार उसका सम्पूर्ण ज्ञान अनुभव पर आधारित होता है |

मौलिक प्रवृत्तियाँ :- सभी ज्ञान व्यक्तियों की उन क्रियाओ के फलस्वरूप प्राप्त होता है, जो वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने में करते है | सुरक्षा, भोजन तथा वस्त्र के लिए मानव जो संघर्ष करता है, उसका परिणाम होता है कुछ क्रियाओ का प्रारम्भ और ये क्रियाएँ ही व्यक्ति की उन प्रवृत्तियाँ, मौलिक भावनाओ तथा रुचियों को जन्म देती है |

चिन्तन की प्रक्रिया :- चिन्तन केवल मनन करने से पूर्ण नही होता और न ही भावना-समूह से इसकी उत्पत्ति होती है | चिन्तन का कुछ कारण होता है | किसी हेतु के आधार पर मनुष्य सोचना प्रारम्भ करता है | यदि मनुष्य की क्रिया सरलतापूर्वक चलती रहती है तो उसे सोचने की आवश्यकता ही नही पडती,
किन्तु जब उसकी प्रगति में बाधा पडती है, तो वह सोचने के लिए बाध्य हो जाता है | मनोविज्ञान के उपरोक्त सिद्धान्तों एवं अवधारणाओं के आधार पर प्रगतिशील शिक्षा की नींव रखी गयी है | जिसमे इस बात पर जोर दिया गया है की बालक को जो शिक्षा दी जाए, वह मानसिक क्रियाओ की विभिन्न दशाओं
के अनुसार हो | प्रगतिशील शिक्षा के अन्तर्गत प्रोजेक्ट विधि, समस्या विधि एवं क्रिया-कार्यक्रम जैसी शिक्षण-पद्धतियों को अपनाया जाता है | जैसे की उपर कहा जा चूका है की प्रगतिशील शिक्षा का एकमात्र-उद्देश्य बालक की शक्तियों का विकास होता है, इसलिए इसके अन्तर्गत इसी बात पर जोर दिया जाता है, किन्तु बालक में शक्तियों का विकास किस प्रकार से होगा, इसके लिए कोई सामन्य सिद्धान्त निश्चित नही किया जा सकता है | इसका कारण यह है की भिन्न-भिन्न रुचियों और योग्यताओ के बालको में विकास भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है |

अध्यापक को बालक की योग्यताओ पर द्रष्टि रखते हुए उसे निर्देशन देना चाहिये | प्रगतिशील शिक्षा यह बताती है की शिक्षा बालक के लिए है, बालक शिक्षा के लिए नही | इसलिए शिक्षा का उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिये, जिसमे प्रत्येक बालक को सामाजिक विकास का पर्याप्त अवसर मिले | प्रगतिशील शिक्षा का उद्देश्य जनतन्त्रीय मूल्यों का विकास किया जाना चाहिये | शिक्षा के द्वारा हम ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते है, जिसमे व्यक्ति-व्यक्ति में कोई भेद न हो, सभी पूर्ण स्वतन्त्रता और सहयोग से काम करे | प्रत्येक मनुष्य को अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों, इच्छाओ और आकांक्षाओ के अनुसार विकसित होने का अवसर मिले, सभी को समान अधिकार दिए जाएँ | ऐसा समाज तभी बन सकता है, जबकि व्यक्ति और समाज के हित में कोई मौलिक अन्तर न माना जाए | शिक्षा के द्वारा मनुष्य में परस्पर सहयोग और सामंजस्य की स्थापना होनी चाहिये | इस तरह, प्रगतिशील शिक्षा का उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का विकास करना और शिक्षा द्वारा जनतंत्र को स्थगित करना होता है | प्रगतिशील शिक्षा में शिक्षण विधि को अधिक व्यावहारिक करने पर जोर दिया जाता है | इस शिक्षण पद्दति में बालक बालक के जीवन, क्रियाओ और विषयों में एकता स्थापित की जाती है |

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यह ल्बल्क के जीवन की क्रियाओ के चारो और सब विषय इस तरह बांध देता है की क्रियाओ के द्वारा उनको ज्ञान प्राप्त हो सके | यहाँ पर शिक्षा-पद्धति को बालक की रूचि पर आधारित करने की बात आती है | प्रगतिशील शिक्षा के अन्तर्गत डीवी ने शिक्षा में दो तत्वों को विशेष महत्त्वपूर्ण माना है-रूचि और प्रयास | अध्यापक को बालक की स्वाभाविक रुचियों को समझकर उसके लिए उपयोगी कार्यो की व्यवस्था करनी चाहिये | बालक को स्वयं कार्यक्रम बनाने का अवसर दिया जाना चाहिये | इससे वे अपनी रुचियों के अनुसार कार्यक्रम बना सकेंगे | इनमे किसी प्रकार के दबाव और भय की आवश्यकता नही है, क्योकि सभी कार्यक्रम रूचि के अनुसार हो सकेंगे और तभी स्कूल की क्रिया आत्म-क्रिया बन सकेगी | डीवी के शिक्षा-पद्धति सम्बन्धी इन विचारो के आधार पर ही आगे चलकर प्रोजेक्ट प्रणाली का जन्म हुआ, जिसके अनुसार बालक को ऐसे काम दिए जाने चाहिये, जिनसे उसमे स्फूर्ति, आत्म, विश्वास, आत्म-निर्भरता और मौलिकता का विकास हो सके | प्रगतिशील शिक्षा में शिक्षक को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है | इसके अनुसार शिक्षक समाज का सेवक है | उसे विधालय में ऐसे वातावरण का निर्माण करना पड़ता है, जिसमे पलकर बालक के सामाजिक व्यक्तित्व का विकास हो सके और वह जनतन्त्र का योग्य नागरिक बन सके |

डीवी ने शिक्षक को यहाँ तक महत्त्व दिया है की उसे समाज में ईश्वर का प्रतिनिधि ही कह दिया है | विधालय में स्वतन्त्रता और समानता के मूल्य बनाए रखने के लिए शिक्षक को अपने को बालको से बड़ा नही समझना चाहिए | उसे आज्ञाओं और उपदेशो के द्वारा अपने विचारो और प्रवृत्तियों को बालको पर लादने का परायास नही करना चाहिए | उसे बालको का निरिक्षण करके उनकी रुचियों, योग्यताओ और गतिविधियों को समझकर उनके अनुरूप कार्यो में लगना चाहिए | इस प्रकार विधालय में शिक्षा बालको की व्यक्तिगत विभिन्नताओ को ध्यान में रखकर दी जानी चाहिए | इससे विधालय के संचालन में कठिनाई बहुत कम हो जाती है | प्रगतिशील शिक्षा के अन्तर्गत अनुशासन बनाए रखने के लिए बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों को कठित करना अनुचित माना जाता है | वास्तव में, अनुशासन केवल बालक के निजी व्यक्तित्व पर ही निर्भर नही है, उसका सामाजिक परिस्थितियों से घनिष्ठ सम्बन्ध है | सच्चा अनुशासन सामाजिक अनुशासन है और यह बालक के विधालय के सामूहिक कार्यो में भाग लेने से उत्पन्न होता है |

विधालय में ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाना चाहिए की बालक परस्पर सहयोग से रहने का अभ्यास करे | विधालय में एक समान उद्देश्य लेकर सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक और शारीरिक कार्यो में एक साथ भाग लेने से बालको में अनुशासन उत्पन्न होता है | और उन्हें नियमित रूप से काम करने के आदत पडती है | विधालयो में कार्यक्रमों का बालक के चरित्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है बालक को प्रत्यक्ष रूप से उपदेश न देकर उसे सामाजिक परिवेश दिया जाना चाहिये और उसके सामने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किये जाने चाहिए की उसमे आत्मानुशासन उत्पन्न हो और वह सही अर्थो में सामाजिक प्राणी बने | यह ठीक है की विधालय में शांतिपूर्ण साधन है, साध्य नही | शिक्षक को तो, अपनी और से बालको को उनकी प्रवृत्तियों के अनुसार नाना प्रकार के कामो में लगाए रखना चाहिये और यदि इस प्रक्रिया में कभी-कभी कुछ अशान्ति भी उत्पन्न हो तो उसे दूर करने के लिए बालक की क्रियाओ पर रोक-टोक करना उचित नही है |

आत्मानुशासन उत्पन्न करने में उत्तरदायित्व की भावना का विशेष महत्व है | उसे उत्पन्न करने के लिए विधालय के अधिकतर काम स्वयं विधार्थियो को सौंप दिए जाने चाहिये | इनमे भाग लेने से उनमे अनुशासन की भावना उत्पन्न होगी | प्रगतिशील शिक्षा के सिद्धान्तों के अनुरूप ही आजकल शिक्षा को अनिवार्य और सार्वभौमिक बनाने पर जोर दिया जाता है | शिक्षा का लक्ष्य व्यक्तित्व का विकास है और प्रत्येक व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व का विकास करने के लिए शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया जाना चाहिये | आधुनिक शिक्षा में वैज्ञानिक और सामाजिक प्रवृत्ति प्रगतिशील शिक्षा का योगदान है | इसके अनुसार शिक्षा एक सामाजिक आवश्यकता है | व्यक्ति का शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक विकास होता है |

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