CTET UPTET Chara Cteristics Good Examinations Study Material in Hindi

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CTET UPTET Chara Cteristics Good Examinations of  Study Material in Hindi

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अच्छी परीक्षाओँ के लक्षण Characteristics of Good Examinations

मूल्यांकन की दृष्टि से अक अच्छी परीक्षा में सामान्यत: निम्नलिखित गुण होने चाहिए

  1. विश्वसनीयता
  2. वैधता
  3. वस्तुनिष्ठता
  4. विभेदीकरण
  5. कठिनाई स्तर
  6. व्यापकता
  7. सहजता

1. विश्वसनीयता

किसी परीक्षा के परिणाम समान परिस्थितियों में एक समान बने रहते हैं तो उस परीक्षा को विश्वसनीय (Reliable) माना जाता है। इस प्रकार किसी परीक्षा की विश्वसनीयता परीक्षा में न्यादर्श की मात्रा (Sample Size) तथा अंकों की वस्तुनिष्ठता (Objectivity in Scoring) पर निर्भर करती है।

Reliability = Sample Size +Objectivity in Scoring

इसी प्रकार, कोई प्रश्न तभी विश्वसनीय कहा जाएगा जब उसके उत्तर विद्दार्थी की सही उपलब्धि स्तर का ज्ञान कराए अर्थात परिणामी अंक त्रुटियों की सम्भावना से मुक्त हों । त्रुटियों की सम्भावना प्राय: निर्देशों की अस्पष्टता के कारण होती है। यह दो स्तरों पर हो सकती है—प्रथन, जब विद्दार्थी प्रश्न का उत्तर दे रहा है और दूसरा, जब परीक्षक उत्तर का मूल्यांकन कर रहा है।
रिजलैण्ड ने विश्वसनीयता को निम्न प्रकार परिभाषित किया है

विश्वसनीयता उस विश्वास (Faith) को प्रकट करती है जो कि एक परीक्षा मं स्थापित की जा सकती है।

  1. वैधता

इसका आशय यह है कि यदि की परीक्षण वही मापन करता है जिसके मापन के लिए इसका निर्माण हुआ है तो वह परीक्षण वैध (Valid Test) कहलाता है। इस प्रकार वैधता गुणक (Validity Index) यह सूचित करता है क किसी परीक्षण ने वस्तुत: उसी विशेषता (Trait) का मापन किस सीमा तक किया है जिसका मापन करने के लए वह दावा करता है। उदाहरणार्थ, गणित की परीक्षा को वैध तभी कहेंगे जबकि उसके द्वारा हम गणित की योग्यता का ही मापन करे, इसके अतिरिक्त भाषा की योग्यता, स्वच्छता अथावा सामान्य बुद्धि का नहीं।

Gulikson  ने निश्चित शब्दों में वैधता को इस प्रकार व्यक्त किया है

It is the correlation of the test with some criteria.

किसी परीक्षा की भाति कोई प्रश्न अपनी वैधता उसी सीमा तक खो देता है जिस सीमा तक वह उददेश्य की पूर्ति में सफल नहीं होता। कोई आइटम (Item) वैध नहीं कहलाएगा यदि वह पाठ्यक्रम से सम्बन्धित न हो जैसे –हम आमतौर पर कहते हैं कि यह पाठ्यक्रम के बाहर है अथवा इसमें कुछ ऐसी अवांधित सामग्री है जिसके मापन का हमारा उददेश्य नहीं है।

सी.बी. गुड के अनुसार वैधता वह सीमा अथवा विस्तार है, जिसक तक परीक्षा उसे मापती है, जिसे वह मापना चाहती है।

रिजलैण्ड के अनुसार वैधता एक मापन-साधन का मापने वाला गुण होती है जिसे वह मापना चाहती है।

ग्रीन महोदय ने वैधता को इस प्रकार परिभाषित किया है

वैधता उस मात्रा की एक अभिव्यक्ति का नाम है जहाँ तक एक परीक्षा उन गुणों, योग्यताओं कौशलों तथा सूचनाओं को मापती है, जिन्हे मापने के लिए वह वाँछित होती है।

  1. विभेदीकरण

विभेदीकरण से तात्पर्य़ परीक्षण के उस गुण से है जिसके द्वारा पढ़ने में तेज, सामान्य एवं पिछडे छात्रों के मध्य काफी सीमा तक भेद किया जा सके। इसके द्वारा यह जाना जा सकता है कि पूरे परीक्षण पर प्राप्तांकों के आधार पर अधिकतम अंक (Maximum Score) एवं न्यूनतम अंक (Minimum Score) पाने वाले छात्रों को अलग करने में प्रत्येक प्रश्न का क्या योगदान रहा। परीक्षण के आइटमों को विभेदीकरण क्षमता ज्ञात करने के लिए प्रत्येक प्रश्न का विश्लेषण किया जाता है, जिसे पद विश्लेषण प्रक्रिया (Item Analysis) कहते हैं। इससे प्रत्येक प्रश्न के कठिनाई स्तर का पता चल जाता है।

  1. वस्तुनिष्ठता

जिस परीक्षा पर परीक्षक का व्यक्तिगत प्रभाव नहीं पड़ता है, वह परीक्षा वस्तुनिष्ठ कहलाती है। किसी भी परीक्षण के लिए वस्तुनिष्ठ होना बहुत जरूरी है, क्योकि इसका विश्वसनीयता व वैधता पर बहुत प्रभाव पड़ता है। एक बार स्कोरिंग कुंजी (Scoring key) बन जाने पर यह प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए कि प्रश्न अस्पष्ट तो नहीं है या उसके उत्तर के बारे में ठीक से निर्णय नहीं लिया जा सकता। अब मूल्यांकन कोई भी करें छात्र को सदैव उतने ही अंक मिलने चाहिएँ, इसी को वस्तुनिष्ठता (Objectivity) कहते हैं। निबन्धात्मक परीक्षाओं (Essay Type) में यह बात नहीं होती। इसमें कापियों का मूल्यांकन करते समय परीक्षक का व्यक्तिगत निर्णय अधिक महत्व रखता है। यही कारण है कि इन परीक्षाओं के स्थान पर हम नवीन परीक्षा प्रणाली (Objective Type Test) को अधिक प्रयोग में लाते हैं।

  1. कठिनाई स्तर

कठिनाई स्त्र प्रश्न का बहुत महत्वपूर्ण लक्षण है। सम्पूर्ण प्रश्न पत्र में दिए गए अंकों के वितरण को इसी के आधार पर निर्धारित किया जा सकता है। उन प्रश्नों में जिनका अंकन शुद्ध अथवा अशुद्ध रूप में किया जा सकता है, कठिनाई स्तर की परिभाषा सही प्रश्न हल करने वाले विद्दार्थियों की प्रतिशतता है। निबन्धात्मक तथा लघु उत्तरीय प्रश्नों में, जो आंशिक रूप से शुद्ध हो सकते है, कठिनाई स्तर का सूत्र निम्न है

D = X/A X 100

जहाँ,   X = प्रश्न में वर्ग द्वारा प्राप्त अंको का मध्यमान

A= निर्धारित पूर्णाक

कठिनाई स्तर वास्तव में सुगमता सूचक होता है क्योकि ज्यों- ज्यों प्रश्न सरल होतका जाता है,  D.I. बढ़ता जाता है। स्पष्टत: यह सूचक एक सामूहिक गुणक है जो शून्य से 100 तक जाता है।

  1. व्यापकता

व्यापकता के अन्तर्गत परीक्षण का वह प्रारूप आ जाता है जिसके द्वारा परीक्षण योग्यता के विभिन्न पक्षों का मापन करनें में समर्थ हो जिसके मापन हेतु उसकों निर्मित किया गया है। परीक्षण की व्यापकता के बारे में निर्णय करना स्वयं एक निर्माता की सूझ-बूझ एवं क्षमता पर निर्भर करता है। माइकेल्स ने व्यापकता की तुलना केक की पर्तो से की है। इस तरीके से हम पाठ्यक्रम में सम्मिलित सभी तथ्यों को न लेकर उनमें से कुछ का न्यादर्श ले सकते है। इस प्रकार संक्षेप में व्यापकता का अर्थ दो प्रकार से लिया जाता है

  • पाठ्य- वस्तु का समावेश
  • उददेश्यों का समावेश
  1. वह परीक्षण जो निर्माण करने, छात्रों द्वारा उसका उत्तर देने एवं अंकदान करने, तीनों पक्षों की दृष्टि से सरल हो, एक अच्छा परीक्षण कहलाता है। अर्थात्, वह परीक्षण जिसके निर्माण में कठिनाई न हो, छात्रों को भी उसके उत्तर देने में सहजता हो तथा अंकन की प्रक्रिया में भी किसी प्रकार की जटिलता न आए, सहजता के गुण वाला परीक्षण कहलाता है।

सी सी रॉस के अनुसार सहजता वह मात्रा है, जिस तक परीक्षा अथवा अन्य साधन को, अध्यापकों तथा पाठशाला प्रबन्धकों द्वारा बिना समय तथा शक्ति के अनावश्यक व्यय के सफलतापूर्वक प्रयुक्त किया जा सकता है। एक शब्द में सहजता का अरथ व्यावहारिकता है।

मूल्यांकन प्रविधियाँ CTET UPTET Study Material in Hindi

मूल्यांकन प्रविधियों की उपयुक्तता इस बात पर निर्भर करती है कि उनके द्वारा अध्यापक को बालक के व्यवहार में परिवर्तन के बारे में कितनी स्पष्ट जानकारी मिलती है. उददेश्यों एवं विषय-वस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही मूल्यांकन की विधि का चयन करना चाहिए। यदि हमने दोषपूर्म प्रविधि का प्रयोग किया तो निकाले गए दोषपूर्ण होगे तथा हमें छात्र के बारे में गलत जानकारी प्राप्त होगी। प्रत्येक उददेश्यों से भिन्न होता है तथा उनसे सम्बन्धित व्यवहार भी भिन्न होते हैं। मूल्यांकन की किसी एक प्रविधि को हम सभी उददेश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयोग में नहीं ला सकते। कुछ मुख्य मूल्यांकन प्रविधियाँ निम्नलिखित हैं।

  1. लिखित परीक्षाएँ इन परीक्षाओं में निबन्धात्मक प्रश्न (Essay Type) तथा वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective type) मुख्य है। निबन्धात्मक परीक्षाओं में छात्र को विस्तारपूर्वक उत्तर लिखने होते हैं, जबकि वस्तुनिष्ठ परीक्षाएँ दो प्रकार की होती हैं। पहली, प्रमापित जिनके सामान्य स्तर रपहले से ही सतापित किए होते है, दूसरी अध्यापक निर्मित जिनमें प्रश्नों का निर्माण शिक्षक स्वयं करता है।
  2. मौखिक परीक्षाएँ इन पीरभाओं द्वारा छात्रों की उपलब्धियों के उन परक्षों का नूल्यांकन किया जाता है जिन्हें हम लिखित परीक्षाओं द्वारा नहीं माप सकके। इन परीक्षाओं में मौखिक प्रश्न, वाद-विवाद विचार-विमर्श एवं नाट्य-प्रदर्शन आदि सम्मिलित हैं। गणित के मूल्यांकुन में मौखिक परीक्षाओं को स्थान दिया जाना चाहिए। लिखित परीक्षाओं की कमियों की पूर्ति किसी सीमा तक मौखिक परीक्षाओँ द्वारा सम्भव है।
  3. प्रयोगात्मक परीक्षाएँ गणित में ज्योमिति, त्रिकोणमिति आदि विषयों में अनेक ऐसे उप- विषय होते हैं जिनमें प्रयोगात्मक कार्य द्वारा प्रत्ययों एवं संकल्पनाओं का स्पष्टीकरण कराया जा सकता है। क्षेत्रफल, ऊँचाई एवं दूरी आदि उप-विषयों में प्रयोगात्मक कार्य बहुत उपयोगी हैं। गणित में इन परीक्षाओं को स्थान दिया जाना चाहिए।
  4. निरीक्षण गणित में निरीक्षण द्वारा छात्रों की उलब्धियों के विषय में साधारण जानकारी मिल सकती है। बालकों की संवेगात्मक स्थिरता, मानसिक परिपक्वता तथा सोचने के तरीकों में यथार्थता की जानकारी कक्षा में प्रतिदिन निरीक्षण द्वारा प्राप्त हो सकती है। विद्दार्थी के व्यवहार में परिवर्तन उसके प्रश्न हल करने की क्रिया के निरीक्षण से भी किया जा सकता है। जब विद्दार्थी प्रश्न हल करता है तो अध्यापक उनका अवलोकन करके यह देख सकता है कि यह शीघ्रता, स्वच्छता एवं शुद्धत्ता से प्रश्नों को हल कर सकता है या नहीं। अवलोकन द्वारा विद्दार्थियों के व्यक्तित्व के अन्य गुणों जैसे आत्मविश्वास, चिन्तन, विवेक, कल्पना, तर्क, सूझ, भावात्मक विकास इत्यादि का भी मूल्यांकन किया जा सकता है।
  5. साक्षात्कार साक्षात्कार द्वारा विद्दार्थियों की गणित में रुचि का विकास , उपयुक्त दृष्टिकोण, आत्म-विश्वास, बौद्धिक स्तर, गणित के ज्ञान का प्रयोग इत्यादि का मूल्यांकन किया जा सकता है। मौखिक परीक्षा तथा साक्षात्कार के उददेश्यों में अधिक अन्तर नहीं है।
  6. प्रश्नावली जब अध्यापक समय की कमी के कारण निरीक्षण तथा साक्षात्कार प्रणाली का प्रयोग नहीं कर पाता तो वह प्रश्नावली प्रविधि का प्रयोग करता है। इसमें विद्दार्थियों को छपी हुई एक प्रश्नों की सूची दे दी जाती है जिन पर वह अपने उत्तर लिखकर अध्यापक को वापिस कर देते हैं इस प्रविधि द्वारा विद्दार्थियों की गणित में रुचि, दृष्टिकोण, अऩुभूति, व्यक्तित्व के गुण तथा अन्य व्यावहारिक परिवर्तनों का मूल्यांकन हो सकता है।
  7. चैक-लिस्ट इसका स्वरूप प्रश्नावली प्रविधि की तरह ही होता है. अन्तर केवल इतना है कि इसमें प्रश्नावली की अपेक्षा प्रश्न तथा कथन बहुत स्पष्ट होते हैं जिन्हे पढ़कर विद्दार्थी केवल उनसे सम्बन्धित उत्तर पर सही का निशान लगाते हैष इसमें उन्हे कुछ भी लिखना नहीं पड़ता। चैक-लिस्ट का उददेश्य प्रश्नालली प्रविधि के ही समान होता है। यह आत्म मूल्यांकन के लिए भी उपयोगी होती है।
  8. अभिलेख विद्दार्थियों की गणित की पुस्तिका, अभिलेख संचिका इत्यादि के अवलोकन से उनकी रुचि, दृष्टिकोण, अनुभूति इत्यादि का मूल्यांकन किया जा सकता है। कक्षा में तथा घर पर किए गए कार्य की पुस्तिकाओं को भी अभिलेख का अंग माना जा सकता है।

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