CTET UPTET Basic Processes Teaching learning Study Material in Hindi

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शिक्षण –अधिगम की मूल प्रक्रियाएँ (Basic Processes of Teaching and Learning)

अधिगम की प्रक्रिया एगांगी होती है अर्थात् शिक्षण अधिगम पृथक- पृथक प्रक्रियाएँ ना होकर क सम्पूर्ण प्रक्रिया है जो यह दर्शाती है कि शिक्षक द्वारा जो प्रक्रिया अपनाई गई है छात्रों ने उसी प्रक्रिया के प्रति अनुक्रिया की है। यही प्रक्रिया तथा अनुक्रिया मिलकर, शिक्षण –अधिगम की प्रक्रिया को पूर्ण बनाती है। अधिगम क सक्रिया प्रक्रिया है जो व्यक्ति के स्वयं के कार्यो पर निर्भर रहती है शिक्षण को प्राय: अधिगम का एक अभाज्य अगं माना जाता है। कुछ शिक्षाशास्त्रियों का एक अभाज्य अंग माना जाता है कुछ शिक्षाशास्त्रियों का विश्वास है कि निश्चित रुप से शिक्षम का अन्त अधिगम में होता है अधिगम एक स्वतन्त्र सम्प्रत्यय है जिसका जिनका अर्थ होता है व्यवहार में परिवर्तन जबकि शिक्षण एक ऐसी पारस्परिक अन्त: क्रिया है जो शिक्षक तथा शिक्षार्थी के बीच चलती है और वह शिक्षार्थी को किसी उददेश्य की और उन्मुख करती है। शिक्षक शिक्षण देता है और बालक उसे ग्रहण करता है बालक का सीखना शिक्षक की सीधी उपलब्धि न होकर बालकों का व्यवहार परिवर्तन होता है किन्तु यह आवश्यक नही कि वयवहार परिवर्तन हो ही और यदि हो भी तो सभी बालकों मं समान मात्रा में हो ऐसा भी सम्भव हे कि कुछ बालकों में व्यवहार परिवर्तन लगभग शून्य हो।

शिक्षण, शिक्षक तथा शिक्षार्थी के बीच चलने वाली एक ऐसी परस्पर अन्त: क्रिया है जिसके द्वारा बालक किसी निश्चित उददेश्य की और उन्मुख होता है तथा शिक्षक द्वारा निर्मित अधिगम की परिस्थितियों की सहायता से सीखता है। शिक्षण का कार्य ऐसी परिस्थितियों तथा विद्दालय और कक्षा में ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जिसके द्वारा अधिगम को और अधिक प्रभावकारी बनाने में सहायता प्रदान की जात4 है। और अधिक प्रभावकारी बनाने में सम्बन्धित मानसिक पर्क्रिया है और शिक्षण अधिगम में सहायता पुँचाने बाला बाह्रा प्रक्रम है शिक्षण को एक त्रयात्मक सम्बन्ध समझना चाहिए, क्योकि शिक्षण में कम से कम एक विषय वस्तु का होना अति आवश्यक है यदि शिक्षक बालक को सिखाने का दृष्टकोण रखता है तो सिखाने के लिए सके पास कुछ चाहिए। यदि शिक्षक र बालक का सम्बन्ध ऐसा है कि उसमें अधिगम को अभिप्रेरित नही करना है तब सम्बन्ध शिक्षम नही होगा यह केवल एक सामाजिक बन्धन मात्र होगा। ठीक इसी प्रकार एक विद्दार्थी और विषय वस्तु दोनों को जोड़ने वाली करड़ी क रुप में शिक्षक एवं विषय वस्तु की उपस्थिति से ही शिक्षण सम्पन्न नही हो जाता एक शिक्षक विषय वस्तु क साथ अपने बालक के सन्दर्भ में ही अन्तर्किया करता है। शिक्षण की त्रयी में शिक्षण शिक्षक तथा शिक्षार्थी के बीच चलने वाली परस्पर क्रिया है रजिसके द्वारा निर्मित अधिगम की परिस्थितियों की सहायता से सीखाता है। शिक्षण का कार्य ऐसी परिस्थितियों तथा विद्दालय और कक्षा में ऐसे बातावरण का निर्माण करना है जिसके द्वारा अधिगम कौर अधिक प्रभावकारी बनाने मं सहायता प्रदान की जाती है। दूसरी शब्दों में अधिगम बालको से समबन्धित मानसिक परक्रिया है और शिक्षण अधिगम में सहायता पहुँचाने वाला बाह्र प्रक्रम है शिक्षण अधिगम प्रक्रिया शिक्षक एवं बालकों के बीच चलने वाली अन्त:प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में पाठ्य वस्तु का प्रस्तुतीकरम एवं व्याख्या करता है। शिक्षण अधिगम में बालकों एवं अध्यापक सम्बन्धित क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। शिक्षक अधिगम की प्रभावशीलता के लिए बालकों के मध्य उपयुक्त प्रभावशाली प्रविधियों युक्तियों, उपायों एवं अभि प्रेरणा का प्रयोग प्रापत् कर सके शिक्षण अधिगम की मूल प्रक्रिया में बालकों द्वारा अर्जित ज्ञान का मूल्यांकन भी होता रहता है और विद्दार्थियों को आवश्यक सुझाव एवं निर्देश भी प्रदान किए जाते है

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शिक्षण- अधिगम की मूल- प्रक्रिया में बच्चे निम्न तरीकों से ज्ञानार्जन करते हैं

  1. करके सीखना
  2. अनुभव द्वारा अधिगम
  3. अनुकरण द्वारा अघिगम

शिक्षण अधिगम की विशेषताएं शिक्षण एक ज्ञानार्जन की क्रिया है जिसमें शिक्षक और बालरक दोनों ज्ञानार्जन की क्रिया है जिसमें शिक्षक और बालक दोनों ज्ञानार्जन करते है इसकी प्रमुख विशेषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. शक्षिण शिक्षा के विभिन्न उददेश्यों को प्राप्त करने का साधन है।
  2. शिक्षण क ऐसी कला है जिसका स्वरुप शिक्षा के उददेश्यों के साथ साथ बदल जाता है।
  3. शिक्षण एक प्रयोगात्मक मनोविज्ञान हे जो बालकों के व्यहार से सम्बन्धित सिद्धान्तों को व्यावहारिक रुप देता है.
  4. शुक्षण शिक्षक का स्वमूल्यांकन है क्योकि इसमें शिक्षक स्वयं की विधियों को बालकों के व्यवहार से जाना सकता हैं।
  5. शिक्षण शिक्षक तथा शिक्षार्थियों के बीच की कड़ी है।

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बच्चों के लिए अधिगम की विधियाँ किसी भी नई क्रिया को सीखने के लिए बच्चों द्वारा विभिन्न प्राकार की विधियों का प्रयोग किया जा सकता है। कुछ प्रमुख विधियां निम्नवत् हैं

  1. प्रयास र भूल क नियम द्वारा सीखना प्रयास और भूल के नियम का प्रतिपादक थॉर्नडाइक को माना जाता है। उन्होने चूहों और बिल्लियों पर अनेक परीक्षण करने के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला कि मानव और पशु दोनों ही प्रयास एवं भूल की विधि द्वारा सीखत है। किसी कार्य को करने के लिए पहले प्रयास किया जाता है और यह आवश्यक नही कि प्रथम प्रयास में ही बह कार्य को करने के लिए पहले प्रयास में ही वहकारय पीरा हो जाए क्योकि उसमें कौई न कोई भूल हो जाने की सम्भावना रहती है और कार्य में सफलता नही मिलती। अब इसे दोबारा दोहराया जाता है और दोबारा करते समय पहली जैसे जैसे प्रयास किया जाता है पुरानी भूलों में कमी आती जाती है और कार्य सम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार बार बार प्रयास करने पार सीखने की प्रक्रतिया पूर्ण हो जाती है और यह कार्य ठीक प्रकार से होने लगता है। प्रयास एवं भूल में मानव प्रेराणायुक्त होता है और अपने निश्चित लक्ष्य तक पहुँचने की और अग्रसर होता है यद्दपि प्राणी का लक्ष्य अस्पष्ट होता है बह अपने इस अस्पष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बार बार प्रयास करता है। असफलता मिलने पर पुन: प्रयास करता है और अन्त में अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है। सही लक्ष्य तक पहुँच जाना ही अधिगम की प्रक्रिया को पूर्ण करता है। उदाहरण के लिए मनुष्य का टाइप सीखना, गणित के सवाल निकालन, साइकिल चलाना सीखना आदि भूल एवं प्रयास द्वारा सीखने के अच्छे उदाहरण है।
  2. अनुकरण द्वारा सीखना सभी बालकों में अनुकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है और यह अनुकरण द्वारा सीखना भू एवं प्रयास द्वारा सीखने की तुलना में उच्च कोटि का है इस नियम द्वारा सीखने में वह दूसरों के अनुभवों का लाभ उठात4 है। इस नियम द्वारा सीखने के लिए बुद्धि की आवश्यकता अधिक होती है। हेंगाटी ने अनुकरण द्वारा सीखने के विषय में एक प्रयोग किया उसने लोहे की एक खोखली नली में केला डाल दिया और क्षूखे बन्दर को कमरे में बन्द करके उसे उस केले वाली खोखली नली को कमरे में डाल दिया। बन्दर उस नली को बार बार जनीन पर पटक कर उस केले को निकालने का प्रयास करने लगा किन्तु उसे कामयाबी नही मिली। तभी बन्दर ने देखा कि उसके पास एक छोटा सा डण्डा पड़ा हुआ है। उसने उस डण्डे को उठाया और नली के अन्दर डाल कर केला बाहर निकाल लिया और उसे खा गया। पहले बन्दर द्वारा इस प्रयास को दूसरे बन्दर को भी दूर से दिखाया जा रहा था। थोड़ी देस बाद इसी प्रकार नली में केला डालकर दूसरे बन्दर के सामने डाला गया। दूसरे बन्दर ने तुरन्त ही डण्डे की मदद से केले को बाहर निकाल कर खा लिया। इस परीक्षण से स्पष्ट हुआ कि पहले बन्दर ने भूल एवं प्रयास के माध्यम से लक्ष्य तक पहुँचने में सफलता पाई जबकि दूसरे बन्दर ने पहले बन्दर का अनुकरण कर तुरन्त ही लक्ष्य तक पहुँचनें में सफलता पा ली इस प्रकार हेंगाटी महोदय नें स्पष्ट किया कि अनुकरण द्वारा सीखना, सीखने की एक महत्वपूर्ण विधि है।
  3. सूझ बूझ द्वारा सीखना सूझ- बूझ द्वारा सीखना सीखने का तीसरा महत्त्वपूर्ण नियम है। सीखने के इस नियम या सिद्धान्त को सर्वप्रथम कोहलर ने प्रतिपादित किया। इस नियम के अनुसार मानव पहले परिस्थितियों का पूर्ण अवलोकन करता है। उसके बारे में सोचता है और फिर क्रियाओं के माध्यम से उसे सीखने का प्रयास करता है। कोई भी प्राणी जब किसी नवीन वातावरण में आता है तो उसका सम्बन्ध विभिन्न तत्वों के साथ स्थापित होता है तो उसका सम्बन्ध विभिन्न तत्वों के साथ स्थापित होता है। वह वातावरण को भली भाँति समझता है ओर फिर उसी के अनुरुप प्रक्रिया करता है। वातावरण को समझना उसकी सूझ-बूझ पर निर्भर करता है। सूझ- बूझ का यह सिद्धान्त पशुओं की तुलना में मानवों पर अधिक लागू होता है। इस सिद्धान्त को सिद्ध करने के लिए कोहलर महोदय ने चिम्पांजियों पर परीक्षण किया। उसने एक चिम्पांजी को पिंजड़े में बन्द कर दिया और कुछ दूरी पर पिजडे से बाहर केले टाँग दिए पिंजड़े में दो बाँस भी डाल दिए। केले पिजड़े से इतनी दूरी पर थे कि चिम्पाजी के हाथ वहाँ केलो तक नहीं पहुंच पा रहे है तो उसने एक डण्डे के सहारे केलों तक पहुँचने का प्रयास किया लेकिन चिम्पांजी को केलों तक पहुँचने का प्रयास किया। लेकिन चिम्पांजी को जब उसमें एक सफलता नही मिली तो वह कुछ सोचता रहा किछ देर के बाद उसने दोनों डण्ड़ो को आपस में जोड़ा और उसकी सहायता से उसने केलों को पिजड़े में खीच कर खा लिया सूझ बूझ के सिद्धान्त में बुद्धि को हना आवशयक है यह परीभम चिम्पाजी पर इसीलिए कीय गया क्योकि चिम्पांजी में थोड़ी बहुत बुद्धि होती है। उसने अपनी सूझ बूझ का इसतेमाल कर केलों को खाने में सफलात प्राप्त की सीखने के यह तीनों विधियों की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका अधा करती है। इन तीन विधियों के अतिरिकत बच्चों को विद्दालय में आंशिक एवं पूरण विधियों और सामूहिक विधियों के माध्यम से भी सीखने के लिए प्रेरित किय जाता है। आंशिक विधि से बालकों को समस्या का पूरण ज्ञान कराया जाता है, जिससे प्रथम बार में बालकों को उस समस्या के बारे में कुछ न कुछ ज्ञान हो जाता है। मानव एक सामाजिक प्राणी है। समाज से बाहर उसका कोई अस्तितिव नही अत:बह समारज में रहते हुए समुहों में बहुत कुछ सीखता है। समूहों में रहते हुए उसका ज्ञान प्राप्त करना ही सामूहिक सीखना कहलाता है। प्रोजेक्त डाल्टन तथा बेसिक विधि वर्कशॉप विधि वाद विवाद समीनार विदि दि सीखने की सामूहिक विधियों के अच्छे उदाहरण है।

Basic Processes Teaching learning Study Material in Hindi

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट हे कि सीखना मानव के व्यवहार में परिवर्तन विभिन्न नियमों के माध्यम से सम्भव होता है। सीखने की प्रक्रिया में सामाजिक वातावरण एवं वंशानुक्रमण अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं।

करते सीखना बालक जिस कार्य को स्वयं करते है, उसे वे जल्दी सीखते है, कारण यह है कि उसे करनें में वे उसके उददेश्य का निर्माण करते है। उसको करने की योजना बनाते हैं और योजना को पूरण करते है। फिर, वे यह देखते है कि उनके प्रयास सफल हुए है या नही। यदि नही, तो वे अपनी गलतियों को मालूम करते उनमें सुधार करने का प्रयत्न करते है। ड़ॉँ मेस का कथन है – स्मृति का स्थान मस्तिश्क में नही, वरन् शरीर के अवयवोंमें है। यही कारण है कि हम करके सीखते है।

निरीक्षण करके सीखना बालक जिस वस्तु का निरीक्षण करत है, उसके बारे में वे जल्दी और स्थायी रुप से सीखते हैं। इसका कारण यह है कि निरीक्षण करते समय वे उस बसतु को छूते है या प्रयोग करते है या उसके बारे में बात चीत करते है। इस प्रकार , इस प्रकार वे अपनी क से अधिक इन्द्रियों का प्रयोग करते है फलस्वरुप, उनके स्मृति –पटल पर उस वस्तु का स्पष्ट चित्र अंकित हो जात है योकम एवं सिम्पसन ने लिखा है निरीक्षण सूचना प्राप्त करने, आधार सामग्री एकत्र करने और वस्तुओं तथा घटनाओं के बारे में सही विचार प्राप्प करने का साधन है

परीक्षण करके सीखना नई बातों की खोज करना, एक प्रकार का सीखना हैष बालक इस खोज को परीक्षण दावारा कर सकता है। परीक्षण के बाद वह किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। इस प्रकार, वह जिन बातों को सीखता हैस वे उसके ज्ञान का अभिन्न अंग हो जाती है, उदाहरणार, वह इस बात का परीक्षण कर सकता है कि गर्मी को ठोस और तरल पदार्थो पर क्या प्रभाव पड़ता है। वह इस बात को पुस्कक में पढ़कर भी सीख सकता है। पर यह सीखना उतना महत्वपूरण नही होता है, जितना कि स्वयं परीक्षम करके सीखना।

सामूहिक विधियों द्वारा सीखना सीखने का कार्य –व्यक्तिगत और सामूहिक विधियों द्वारा होता है। इन दोनों में सामूहिक विधियों को अधिक उपयोगी और प्रभावशाली माना जाता है इनके सम्बन्ध में कोलसनिक की धारण इस प्रकार है बालक को प्रेरण प्रदान करने, से शैशिक लक्ष्य को प्राप्त करने  में सहायता दैने , सके मानसिक स्वास्थया को उत्तम बनाने, उसके सामाजिक समायोजन को अनुप्राणित करने, उफसके व्यवहार में सुधार करने और उसमें आत्मनिर्भरता तथा सहयोग की भावनओं का विकास करने के लिए व्यक्तिगत विधियों की तुलना में सामूहिक विधियाँ कही अधिक प्रभावशाली हैं

मिश्रित विधि द्वारा सीखना अधइगम की दो महत्वपूर्ण विधियाँ है  पूर्ण विधि और आंशइक विधि पहली विधि में बालकों को पहले पाठ्य विष्य का पूरण ज्ञान दिया जा4त है और फिर सके विभिन्न अंगों से सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। दूसरी विधि में पाठ्य व्ष्य को खण्डों में बाँट दिया जाता है आधुनिक विचारधारा के अनुसार इन दोनों विधियों को मिलाकर सीखने के लिए मिश्रित विधि का प्रयोग किया जाता है।

सीखना एक सामाजिक गतिविधि है प्रत्येक व्यक्ति एक शिशु के रुप में कुछ जन्मजात प्रवृत्तियों को लेकर जन्म लेता है। ये प्रतवृत्तियाँ उसकी प्रारम्भिक प्रतिक्रियाओं की दिशा निर्धारित करती है। जिसके आधार पर शिशु स्वयं को अनुकूलित करने का प्रयास करता है, लेकिन वह असफल रहता है। शिशु को अपनी प्रति क्रियाओं एवं व्यवहारों को अधिक व्यापक और वातावरण के उपयुक्त बनाने के लिए विभिन्न क्रियाओं को सीखना पड़ता है। मनुष्य एक सामाजिक एवं बौद्धिक प्राणी है सामाज में रहकर ही उसका विकास सम्भाव है। सामाजिक परीवेश एवं परिस्थितियाँ बच्चे को सीखने की प्रेरणा प्रदान करती है। प्रारम्भ में मानव शिशु असहाय एवं पराश्रित होता है, लेकिन धीरे धीरे उसके व्यवहार में परिवर्तन एवं परिवर्द्धन होता है और स्वयं को आत्मनिर्क्भर बनाने लगता है। बच्चों में सीखने की प्रक्रिया का श्रीगणेश परिबार से होता है, वह परिवार में रहकर ही सत्य असत्य सही-गलत, उचित, अनुचित आदि का ज्ञान प्राप्त करता है। जीवन के आरम्भिक दौर में शिशु अनुभव एवं अनुकरण द्वारा भिन्न- भिन्न प्राकार की बातों को सीखता है उसके सीखनें में परिबार, समाज, समुह, पास पड़ोस आदि का प्रभाव पड़ता है। बच्चे दूसरों के सम्पर्क में आकर नए अनुभव प्राप्त करते हैं और अनेक ऩई बाते सीखते है। बालक, समाज, परिवार तथा अपने बड़ों के कार्यो को देखकर, समाज की अनेक बातों को सीख लेता है। यह अधिगम प्रत्यक्षीकरण एवं अनुकरम द्वारा होता है। हम अपने जीवन में दूसरों से न केवल सम्पर्क स्थापित करना सीखते है, बल्कि यह भी सीखते हैं कि दूसरों को सहयोग देक और उनकी इच्छों की पूर्ति करके हम अपनी स्वयं की इच्छों और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उनका सहयोग एवं सहायता प्राप्त कर सकते है। इतना ही नही, दूसरों के सम्पर्क में आकर हम अनेक ऩए अनुभव प्राप्त करते है और अनेक नई बाते सीखते है। जिनके फलस्वरुप हमारे व्यवहार में चेतन अथवा अचेतन रुप में परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार सीखना एक सामाजिक प्रक्रिया है। उपरोक्त बातों के आधार पर हम कह सकते हैं कि सीखना एक सामाजिक गतिविधि है।

मर्सेल के अनुसार सीखना अनेक प्रकार का होता है, जैसे मानसिकस शारीरिक, संवेगात्मक और सामाजिक के द्वारा सीखना आदि विस्तत अर्थ में सभी प्राकार से सीखना- सामाजिक होता है, क्योकि इसी के कारण व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन होता है। पर सामाजिक द्वारा सीखना अपनी एक विचित्र विशेषाता के कारण सभी प्रकार के सीखने से भिन्न है। इस विशेषता को मरसेल ने अग्रंकित शब्दों में व्यक्त किया है। – सामाजिक द्वारा सीखने की एक विचित्र विसेषता यह है कि यद्दपि हम सारे समय इसकी प्रक्रिया में व्यक्त रहते है, पर हमकों बहुधा इस बात का कोई ज्ञान नही होता है कि हिम कुछ सीख रहे है।

 

 
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