CTET UPTET 2017 Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi

CTET UPTET 2017 Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi

CTET UPTET 2017 Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi

अधिगम का मूल्यांकन Assessment of learning (CTET UPTET 2017 Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi)

मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा अधिगम परिस्थितियों तथा सीखने के अनुभवों के लिए प्रयुक्त की जाने वाली समस्त विधियों और प्रविधियों की उपादेयता की जाँच की जाती है। मूल्यंकन शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का एक ऐसा सोपान है जिसमे शिक्षक यह सुनिश्चत करता है किर उसके द्वारा की गई शिक्षण व्यवस्था तथा शिक्षण को आगे बढाने की क्रियाएँ कितनी सफल हो रही है यह सफलता शिक्षण उददेश्यों की प्राप्ती प्रत्युत्तर का कार्य करती है इस तरह, मापन के आधार पर शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों में आवश्यक सुधार लाने के उददेश्य से मूल्यांकन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें यह देखा जाता है कि पूर्व- निर्धारित उददेश्यों की प्राप्ति हुई है या नही और यदि नही हुई है तो कितनी सीमातक यह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसका शैक्षिक उददेश्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। यह शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनोंके लिए पुनर्बलन का कार्य करता है।

अधिगम का मूल्यांकन क्या है? (CTET UPTET Study Material)

अधिगम के मूल्यांकन में उपलब्ध प्रमाणों के साथ कार्य करनै शामिल है, जो स्ठाफ और व्यापक मूल्यंकन समुदाय को विद्दार्थियों की प्रगति जाँच करने और इस सूचना का अनेक तरीकों से इस्तेमाल करने में समर्थ बनाता है।

अधिगम के मूल्यांकन की विशेषताएँ

  • यह मूल्यांकन शिक्षा –प्राप्ति के बाद किया जाता है।
  • सूचना अध्यापक द्वारा एकत्र की जाती है।
  • सीचना को सामान्य रुप से अंको अथवा ग्रेडों मे रुपान्तरित किया जाता है
  • यह इसके पहल प्राप्त की गई शिक्षा पर नजर डालता है।

अधिगम के अच्छे मूल्यांकन के मानदण्ड

  • ये युक्तिसंगत होते है (ठोस मानदण्डों पर आधारित )
  • ये विश्वसनीय होते है (मूल्यांकन और पद्धति का सीह होना)
  • ये तुलनीय होते है (जब इनकी तुलना अन्य विभागों अथवा विद्दालयों में की गई जाँच परख से की जाती है, तो ये ठीक पाए जाते है)

विद्दालय आधारित मूल्यांकन

विद्दालय- आधारित मूल्यांकन, विधद्दालय शिक्ष बोर्डो द्वारा जारी किए गए मार्गनिर्देशों के अनुसार अध्यापकों द्वारा किया जाता है, किन्तु इस प्रणाली में कुछ त्रुटियाँ उत्पन्न हो गई है। कई बातों को इन त्रुटियों का कारण ठहराया जा सकता है। बुनियादी कारण नूल्यंकन के स्थान और शिक्षा की प्रक्रिया में इसके महत्व के बारे मॆं अद्यापको की गलत धारणा है। दूसरा का4रण बाह्रा परीक्षा की प्रथा4 का अनुकरण है, जो सामान्य रुप से सत्र के अन्त में ली जाती है।

मूल्यांकन की विद्दालय –आधारित प्रणाली में, मूल्यांकन के प्रयोजन का केन्द्र- बिन्दु बदल गया है। अब इसमें तत्परता परीक्षण, विकास की जाँच परख संज्ञानात्मक, भावात्मक और मनो- प्रेरक (साइकोमोटर ) क्षेत्रों में कार्य निष्पादन का बार बार सुनियोजित और प्रभावकारी तरीके से मूल्यांकन किया जाना शामिल है।

विद्दालय – आधारित मूल्यांकन की विशेषताएँ (CTET UPTET 2018 Model Paper)

  • यह पारम्परिक प्रणाली से अधिक विस्तृत, अधिक व्यपक र सतत् होता है।
  • इसका मुख्य लक्षण शिक्षार्थी को सुनियोजित अधिगम और विकास की ओर उन्मुख करने में सहायता देना होता है।
  • यह भविष्य के जिम्मेदार नागरिक के रुप में शिक्षार्थि की आवश्यकताओं का ध्यान रखता है।
  • यह अधिक पारदर्शी, भविष्यात्मक और शिक्षार्थियों, अध्यापकों और माता पिता के बीच सहयोजन की अधिक गुंजाइश मुहैया कराने वाला होता है।

दूसरे शब्दों में, विद्दालय आधारित मूल्यांकन ब7ल केन्द्रित, विद्दालय केन्द्रित और बहु आयामू मूल्यांकन होता है। इसलिए, यह8 सच्चे अर्थो में, शिक्षार्थी के सर्वतोनमुखी विकास के बाहार होनो जगहो पर जीवन में सभी प्राकर की शिक्षा प्राप्ति को  प्रोत्साहित करता है। यह बाल –केन्द्रित होता है, क्योकि यह विकास के वैयक्तित स्वरुप की दृष्टि से विद्दार्थी को एक अदिवतीय अस्तित्व मानता है यह अपनी शिक्षा के पहल स निर्धारित लक्ष्यों और उददेश्यों को प्राप्त करने के लिए शिक्षार्थी का एक अलग व्यक्तित्व के रुप में अन्य शिक्षार्थियों की तुलना केवल उसकी स्थिति के रुप में नही बल्कि प्रत्येक बच्चे की अपनू वैयक्तिक योग्यदताओं प्रगति और विकास के आधार पर निर्माण करता है।

विद्दालय आधारित मूल्यांकन, अध्यापकों को अपने विद्दार्थियों के बारे में निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर जानने के भी अवसर प्रदान करता है

  • वे क्या सीखते है?
  • वे कैसे सीखते हैं?
  • सामूहिक रुप से सीखने में उन्हे किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है?
  • बच्चे क्या सोचते है?
  • बच्च क्या महसूस करते है?
  • उनकी रुचियाँ और प्रवृत्तियाँ क्या है?

इसक अलावा, यह मूल्यांकन शिक्षार्थि को अपनी क्षमता का उपयोग बेहतर तरीके सै करने में सहायता देता  है। यह अध्यापकों को ऐसे तरीको को ढूँढने  के लिए पैनी दृष्टि प्रदान करता है, जो अलग –अलग शिक्षार्थियों के लिए अपनी समस्याओं और कठिनाइयों का समाधान करने में सहायक सिद्ध हो सकते है

यह मूल्यांकन बाल केन्द्रित होने के अलावा, विद्दालय केन्द्रित भी है। इसका अर्थ यह है कि बाहार  का कोई अभिकरण इस मूल्यांकन प्रक्रिया में हस्तक्षेप नही करता । यह पूरी तरह से विद्दालय आधारित है और अध्यापक द्वारा किया जाता है। अध्यापक पर भरोसा का जात है और इस संक्षिप्त विवरण के साथ ही अध्यापक अपने विद्दार्थियों के बारे में सबसे अधिक जानता है, उसे विद्दार्थियों का मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी दी जाती है।

विद्दालय आधारित मूल्यांकन बहु आयामी होता है इसके बहु आयमी स्वरुप  का पता इस बात से लगता है कि यह शिक्षार्थियो के सामाजिक भावात्मक, शारिरिक, बौद्धिक विकास और विकास के उन क्षेत्रों की आवश्यकता को स्वीकार करता है और उनका ध्यान रखता है, जो परस्पर सम्बन्धित होते है और जिन प्र अलग से विचार नही किया जा सकता है?

विद्दालय –आधारित मूल्कन को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता (CTET UPTET Study Material in Hindi)

पारम्परिक मूल्यांकन में केवल सीमित तकनीकों का प्रयोग किय जाता है, जिससे विद्दार्थियों की परख अच्छी तरह नही  हो पाती इसलिए विद्दालय आधारित नवीनतम मूल्यांकन पद्धतियों की आवश्यकता है। वास्तव में, बाह्रा परीक्षाओं ने स्कूलों में मूल्यांकन की स्थिति को प्रभावित करना शुरु कर दया थी और अध्यापन  की सनूची प्रक्रिया सार्वजनिक परीक्षा के अनुकूल बननी शुरु हो गई थी।

पारम्परिक बाह्रा परीक्षा विद्दालय शिक्षा की अन्तिम व्यवस्थी में वर्ष के अनत मे एक प्रसास परीक्षा होती है। यह मूख्यत:विद्दार्थइयो के ज्ञान के केवल शैक्षिक पहलुओं का मूल्यांकन करती है यह बच्चों की सभी योग्यताओं का मूल्यांकन नही करती लिखित परीक्षा में प्राप्त किए गए कों के आधार पर विद्दार्थियों को उत्तीर्ण अथवा अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता है और उन्हे पूर्व निर्धारित डिविजनों में और आगे वर्गीकृत किया जाता है। उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण प्रणाली निराशा उत्पन्न करती है और अमानवीय है, क्योकि अनुत्तीर्ण उम्मीदवार यह महसूस करने लगते है कि वे विल्कुल निकम्मे है। सह शैक्षिक क्षेत्रों की  लगभग पूरी तरह से उपेक्षा कर दी जाती है और शिक्षा तथा मूल्यांकन की इस समय प्रचलित स्कीम में उनका कोई स्थान नहीं होता। परीक्षा –परिणामों का विश्लेषण और व्याख्या वैज्ञानिक तरीके से नही की जाती।

पारम्परिक बाह्रा परीक्षा की उपरोक्त कमियों को दूर करने के लिए विद्दालय- आधारित सतत् र व्यापक मूल्यांकन प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए, जिसके निम्नलिखित उददेश्य होते है

  • बच्चों पर पडने वाले दबाव को कम करना।
  • मूल्याकन को व्यापक और नियमित बनाना।
  • अध्यापक को सृजरनात्मक अध्यापन के लिए गुंजाइश मुहैया कराना।
  • निदान और उपचार के साधन की व्यवस्था करना।
  • अपेक्षाकृत अधिक कौशलों वालेशिक्षार्थियों का निर्माण करना।
  • अध्यापकों, विद्दार्थियों, माता- पिता और समाज के प्रभावकारी, उपयोग के लिए परिणामों की कार्यात्मक और अर्थपूर्ण घोषणा।
  • विद्दार्थियों की न केवल उपलब्धियों और प्रवीणातओं के स्तरों के निर्धारण के प्रयोजनों के लिए बल्कि निदान और उपचार को समृद्ध बनाने वाले कार्यक्रमों के जरिए उनमें सुधार करने के लिए परीक्षा के परिणामों का अधिक व्यापक रुप से उपयोग।
  • बहुत –से अन्य सम्बन्धित प्रयोजनों को पूरा करने के लिए परीक्षाएँ लेने की क्रियाविधि में सुधार।
  • शिक्षण सामग्री और प्रणाली में सहवर्ती परिवर्तन करना।
  • माध्यमिक अवस्था से लेकर आगे तक सेमेस्टर प्रणाली लागू करना।
  • विद्दार्थी के कार्य –निष्पादन और उसकी प्रवीणता के स्तर क् निर्धारण के लिए और उसकी घोषणा करने के लिए अंकों के स्थान पर ग्रेडों का उपयोग करना।

सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन: महत्व एवं अभ्यास(Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi)

सतत् और व्यापक मूल्यांकन क्या है?

आज हमारे समक्ष पारम्परिक परीक्षा प्रणाली और मूल्यंकन को बदलने की चुनौती उभरकर आई है। माध्यमिक स्तर पर सतत् एवं व्यापक लूल्यंकन को अपने सभी विद्दालयों में लागू करते हुए सीबीएसई ने यह स्पष्ट सन्देश दिया है कि नूल्याकन करते समय विद्दार्थी के सर्वागीण विकास को ध्यान में रखा जाना चाहिए अधिगम एक सतत् प्रक्रिया है इसलिए मूल्यांकन भी सतत होना चाहिए। मूल्याकन अध्यापन एवं अधिगम की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। सतत् एवं व्यापक मूल्याकन में मूलरुप से विद्दार्थी के ज्ञान की परिक्षा के स्थान पर उसके अधिगम की प्रक्रिया को मूल्यांकन के लिए चुना गया है। सतत् और व्यापक मूल्याकन (सीसीई) का अर्थ छात्रों के विद्दालय आधारित मूल्यांकन की प्रणाली से है जिसमें छात्रों के विकास के सभी पक्ष शामिल है। यह एक बच्चें की विकास प्रक्रिया है, जिसमे दोहरे उददेश्यों पर बल दिया जाता है। ये उददेश्य एक और मूल्याकन में निरन्तरता और व्यापक रुप से सीखने के मूल्यांकन पर तथा दूसरी और व्यवहार के परिणामों पर आधारित है। यहाँ निरन्तरता का अर्थ इस पर बल देना है कि छात्रों की वृद्धि और विकास के अभिज्ञात पक्षों का मूल्यांकन एक बार के कार्यक्रम के बजाए एक निरन्तर प्रक्रिया है, जिसे सम्पूर्ण अध्यापन अधिगम प्रक्रिया में निर्मित किया गया है और यह शैक्षिक सत्रों की पूरी अवधि में फैली हुई है। इसका अर्थ है मूल्यांकन की नियमिताता अधिगम अन्तरालों का निदान, सुधारत्मक उपयोग, स्वयं मूलांकन के लिए अध्यापकों और छात्रों के साक्ष्य का फीडबैक अर्थात प्रतिपुष्टि। दूसरा पद व्यापक का अर्थ शैक्षिक और सह शैक्षिक पक्षों को शामिल करतो हुए छात्रों की वृद्धि और विकास को परखने की यौजना चूकि क्षमताएँ, मनोवृत्तियाँ और सोच अपने आप को लिखित शब्दों के अलावा अन्य रुपों में प्रकट करती है, इसलिए यह पद अनेक साधनों और तकनीकों के अनुप्रयोग को सन्दर्भित करता है (परीक्षाणकारी और गैर परीक्षणकारी दोनों ) और यह सीखने के क्षेत्रों में छात्रों के विकास के मूल्यांकन पर लक्षित है जैसे: ज्ञान समझ, व्याख्या, अनुप्रयोग, विश्लेषण, मूल्याकन एवं सृजनात्मकता। सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन के उददेश्य है

  • बोधात्मक, मनोप्रेरक और भावात्मक कौशलों के विकास में सहायता ।
  • सीखने की प्रक्रिया पर बल देना और याद रखने पर बल नहीं देना।
  • मूल्यांकन को अध्यापन- अधिगम प्रक्रिया का अविभाज्य हिस्सा बनाना
  • नियमित निदान के आधार पर उपचारात्मक अनुदेशों के बाद छात्रों की उपलब्धियों और अध्यापन अधिगम कार्यनीतियों के सुधार के लिए मूल्यांकन का उपयोग करना।
  • मूल्यांकन को निष्पादिन के वांछित स्तर पर बनाए रखने के लिए गुणवत्ता नियन्त्रण युक्ति के रुप में इस्तेमाल करना
  • सामाजिक उपयोगिता, वाछनीयता, या एक कार्यनीतियों के सुधार के लिए मूल्यांकन का उपयोग करना
  • मूल्यकन को निष्पादिन के वांछित स्तर पर बनाए रखने के लिए गुपवत्ता नियन्त्रण युक्ति के रुप में इस्तेमाल करना
  • अध्यापन और अधिगम प्रक्रिया को छात्र केन्द्रित कार्यकलाप बनाना

किस बात का मूल्यांकन किया जाना चाहिए?(Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi)

चूँकि शिभा का सम्बन्ध बच्चे के सर्वागीण विकास (शारीरिक, सामाजिक –भावनात्मक, बौद्धिक, आदि ) से है, इसलिए बच्चे के विकास के सभी पहलुओं को आँके जाने की आवश्यकता है। इस सरमय हम समूचे बच्चे को नही आँकते, बल्कि विशिष्ट क्षेत्रों में केवल उसकी शैक्षिक उपलब्धियों का मूल्यांकन करते है। हम शिक्षार्थी का मूल्यांकन बुनियादी रुप से उसके परीक्षा परिणामों के आधार पर करते है, हम सीखने के लिए किए गए प्रयास, कार्य निष्पादन, अभिवृत्तियों का और जो कुछ सीखा गया है, उसका उपयोग विभिन्न स्थितियों में करने की योग्यता का मूल्यांकन नही करते , और न ही हम उनक4 मूल्यांकन इस आधार पर करते हैं कि वे तकनीके कितने प्रभावकारी रुप से कारती हैं अथवा विभिन्न सिद्धान्तों का मूल्यांकन कितने विवेचानात्मक ढंग से करते है। इस प्रक्रिया के स्वरुप को अधिक व्यपक बनाने के लिए महत्वपूर्ण है कि बच्चे की शिक्षा –प्राप्ति का निर्धारण कक्षा के अन्दर और बाहर की हर एक प्रकार की स्थितियों और वातावरण में किया जाए। यह जरुरी है कि निर्धारण अथवा मूल्यांकन की प्रक्रिया सूचना और अध्यापक शिक्षा के प्रत्याशित परिणाम प्राप्त करने में किस हद तक सफल हुए है।

बच्चे की शिक्षा प्राप्ति का एक पूरा चित्र प्राप्त करने के लिए मूल्यांकन का ध्यान इस बात पर केन्द्रित होना चाहिए कि निम्नलिखित बातों के लिए शिक्षार्थी में कितनी योग्यता है

  • विभिन्न विषय क्षेत्रों के सम्बन्ध में वांछित कौशल सीखना और प्राप्त करना।
  • विभिन्न विषय क्षेत्रों मे अपेक्षित मात्रा में सफलता का स्तर प्राप्त करना
  • बच्चे के वैयक्तिक कौशलो, रुचियों अभिवृत्तियों और अभिप्रेरणा का विकास
  • एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन का अर्थ समझना और वैसा जीवन बिताना।
  • समय समय पर बच्चे के ज्ञान , आचरण और प्रगति में होने वाले परिवर्तनों को मॉनीटर करना
  • स्कूल के अन्दर और स्कूल के बाहर दोनों स्थानों पर विभिन्न स्थितियों और अवसरों में प्रतिक्रिया
  • जो कुछ सीखा है, उसका उपयोग विभिन्न पर्यावरणों, परिस्थितियों और स्थितियों में करना
  • स्वतन्त्र रुप से, मिलकर और सामञ्जस्यपूर्ण तरीके से कार्य करना।
  • विश्लेषण और मूल्यांकन।
  • सामाजिक और पर्यावरणिक मुददों से सुपरिचित होना
  • सामाजिक और पर्यावरणिक परियोजनाओं में और उददेश्यों के लिए भाग लेना
  • जो कुछ सीखा है, उसे याद करना।

भविष्य के विद्दालयों के लिए यह जरुरी होगा कि वे अपने शिक्षार्थियों में जोखिम लेने, अनुकूलनीय बनने, लचीला बनने की योग्यता और निरन्तर होने वाले परिर्वतनों का सामना करने और जीवन भर शिक्षार्थी बने रहने की  योग्यता विकसित करे। इस सन्दर्भ में, शिक्षार्थी सक्रिया नेता और अध्यापक समर्थ बनाने वाले बन जाते है

यह देखने से पहल कि निर्धारण किस प्राकर किया जाना है, अध्यापकों के लिए यह जरुरी है कि वे यह निर्धारण किस प्रकार  किया जाना है, अध्यापकों के लिए यह जरुरी है कि वे यह निर्धारित करे कि माध्यमिक स्तर पर किन उददेश्यों को प्राप्त किया जाना है। उन्हें यह देखने की जरुरत है कि माध्यमिक शिक्षा को बच्चों के अन्दर न केवल संज्ञानात्मक क्षेत्रों में, बल्कि मनोप्रेरक और प्रभावकारी क्षेत्रों में क्या विकसित करना चाहिए उन्हे मूल्यांकन की कसौटियों और पद्धतियों में उपयुक्त विशेषताओं के साथ साथ विभिन्न आयु सम्बन्धित सूचकांकों और आचरणों को भी शामिल करना चाहिए उन्हे यह निर्धारित भी होने पर वे शिक्षार्थी क्या अपेक्षाएँ करते है, और विभिन्न पहलुओं और ज्ञान के क्षेत्रों के सम्बन्ध में किस प्रकार की प्रोफाइल रिपोर्ट की जरुरत ह, जो बच्चे के लिए तेजी से बदलते हुए वैयक्तिक विकास को दर्शाती हो।

यह निर्धारण अथवा मूल्यांकन एक उपयोगी , वाछनीय और अक समर्थकारी प्रक्रिया है। इसे पूरा करने के लिए, हमारे लिए निम्नलिखित प्राचलों को ध्यान में रखना जरुरी है।

  • विद्दार्थी का मूल्यांकन एक करना।
  • शिक्षार्थी के ज्ञान और पाठ्यक्रम के विषय और अन्य विषयों के बारे में उसकी प्रगति के बारे में सूचना एकत्र करने के लिए विविध प्रकार के तरीको का उपयोग करना।
  • सूचना निरन्तर एकत्र करते रहना और उसे अभिलेखबद्ध करना।
  • प्रत्येक विद्दार्थी के प्रत्युत्तर देने और सीखने के तरीके और उसमें लगने वाले समय को महत्व देना।
  • निरन्तर आधार पर रिपोर्ट देना और सीखने के तरीके और उसमें लगने वाले समय को महत्व देना
  • फीडबैक मुहैया करना, जिससे सकारात्मक कार्रवाई की जा सकेगी और विद्दार्थी को बेहतर ढग से कार्य करने में सहायता मिलेगी।

मूल्यांकन की प्रक्रिया में, निम्नलिखित कार्य नहीं करना चाहिए

  • शिक्षार्थियों को मन्द, कमजोर, बुद्धिमान आदि के रुप में वर्गीकृत करना।
  • उनके बीच तुलना करना।
  • नकारात्मक बयान देना।

क्या और कब मूल्यांकन किया जाना चाहिए, इसके साथ बच्चे की प्रगति की नियतकालिकता का नाजुक प्रश्न जुडा हुआ है। सम्पूर्णतावादी शिक्षा में शिक्षा –प्राप्ति के परिणामों का मूल्यांकन अध्यापन शिक्षा प्राप्ती सत्र में तीन भाग शामिल होने चाहिए – शिक्षा प्राप्ति की प्रक्रिया, जो सीखा गया है, उसका अनुप्रयोग, और जो सीख गया है उसका मूल्यांकन यह एक ऐसा तरीका है जिससे शिक्षा प्राप्ति और मूल्यांकन को मिलाय जा सकता है। सतत् और व्यापक मूल्यांकन करने के लिए, शैक्षिक और सह शैक्षिक दोनो पहलुओं को समुचित मान्यता दी जामी जरुरी है। ऐसे सम्पूर्णवादी मूल्यांकन के लिए प्रत्येक विद्दार्थी का क चालू, बदलता हुआ और व्यपक विवरण रखना जरुरी है, जो ईमानदार, उत्साहजनक और विवेकपूर्ण हो। हालाँकि अध्यापन प्रतिदिन उपचारात्मक कारयनीतियों पर विचार करते है, उनकी योजना बनाते है और उन्हे  कार्यान्वित करते है, लेकिन यह भी जरुरी है कि बच्चे ने किसी अबधि में जो कुछ सीखा है उसे बनाए रखने और उसे व्यक्त करने की उसकी योग्यता का निर्धारण आवधिक रुप से किया जाए। ये निर्धारण कई रुप ले सकते है लेकिन यह सब यथासम्भव हद तक व्यापक और विवेकपूर्ण होने चाहिए । बच्चों में न केवल ज्ञान प्राप्त करने और उसे याद रखनें, बल्कि उनके ललित कौशलों को भी बढावा देने के लिए सामान्य रुप से साप्ताहिक, पाक्षिक अथवा तिमाही समीक्षओं की (शिक्षा –प्राप्ति के क्षेत्रों के आधार पर) सिफारिश की जाती है, जो खुले रुप से एक शिक्षार्थी की तुलना किसी अन्य शिक्षार्थी से नही की जाती और जो सकारातमक और राचनात्मक अनुभव होती है। अध्यापन शिक्षा प्राप्ति की प्रक्रिया में सुधार करने के लिए निर्धारण रचनात्मक और सारांशात्मक होना चाहिए

सतत् और व्यापक मूल्यांकल की विशेषताएँ(Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi)

  • सतत् और व्यापक मूल्यांकनके सतत् पहलू के अन्तर्गत मूल्यांकन के सतत् और आवधक पहलू का ध्यान रखा जाता है।
  • निरन्तरता का अर्थ है शिक्षा के प्रारम्भ में विद्दार्थियों का निर्धारण (स्थापना मूल्य) और शिक्षण प्रक्रिया के दौरान निर्धारण (रचनात्मक मूलांकन) जो मूल्यांकन की बहुविध तकनीकों का उपयोग करके, अनौपचारिक रुप से किया जाता है।
  • नियतकालिकता का अर्थ है कार्य निष्पादन का निर्धारण, जो यूनिट/अवधि के समाप्त होने पर बार बार किया जाता है। (सासांशात्मक)
  • सतत् और व्यापक मूल्यांकन का व्यापक संघटक बच्चे के व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास के निर्धारण का ध्यान रखता है। इसमें विद्दार्थियों के विकास के शैक्षिक और इसके अलावा सह शैक्षिक पहलुओ का निर्धारण शामिल है।
  • शेक्षिक पहलुओं में पाठ्यक्रम के क्षेत्र अथवा विषय –सापेक्ष क्षेत्र शामिल होते है, जबकि सह शैक्षिक पहलुओं में जीवन कौशल, सह पाठ्यचर्या अभिवृत्तियाँ और मूल्य शामिल होते हैं।
  • शैक्षिक क्षेत्रों में निर्धारण, निरन्तर और नियतकालिक रुप से मूल्यांकन की बहुविध तकनीको का इस्तेमाल करके अनौपचारिक और औपचारिक रुप से किया जाता है। नैदानिक मूल्यांकन यूनिट/ परीक्षा के सामाप्त होने पर किया जाता है। कुछ यूनिटों में घटिया कार्य –निष्पादन के कारणों का पता नैदानिक परीक्षणों का उपयोग करते हुए लगाया जाता है। इसके बाद उपयुक्त रुप से हस्तक्षेप किय जाता है और कार्रवाई की जाती है और तत्पश्चात् पुन: परीक्षण किए जाते है।
  • सह –शैक्षिक क्षेत्रों में निर्धारण निर्धारित मानदण्ड़ो के आधार पर बहुविध तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए किया जाता है जब जीवन कौशलों का निर्धारण, निर्धारण के सूचकों और जाँच सूचियों के आधार पर किया जाता है।

यह देखा गया है कि आमतौर पर किसी विषय के तथ्यों उसकी संकल्पानाओं, उसके सिद्धान्तों, आदि के ज्ञान और उनकी समझ जैसे शैक्षिक तत्वों को या तो मूल्यांकन किया जाता है।सह शैक्षिक तत्वों को या तो मूल्यांकन की प्रक्रिया से बिल्कुल बाहर रखा जाता है, अथवा उनकी और पर्याप्त ध्यान नही दिया जाता। मूल्यांकन को व्यापक बनाने के लिए, शैक्षिक और सह शैक्षिक पहलुऔओं के मूल्यांकन स्कीम में अवश्य शामिल किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति सम्बन्धी दस्तावेज 1986, जिसका 1992 में संशोधन किया गया है, में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि मूल्यांकन योजना में शिक्षा के विषयों और सह शिक्षा के सभी शिक्षण सम्बन्धी अनुभवों को शामिल किया जाना चाहिए  व्यापक मूल्यांकन के लिए अनेक प्रकार की तकनीकों और साधनों का उपयोग करना जरुरी होगा। इसका कारण यह है कि शिक्षार्थी की संवृद्धि के विभिन्न विशिष्ट क्षेत्रों का मूलांकन कतिपय विशेष तकनीकों के जरिए किया जा सकता है।

व्यापक और सतत् मूल्यांकन के कार्य एवं महत्व(Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi)

अध्यापन शिक्षाप्राप्ति प्रक्रिया में, मूलांकन से शैक्षिक और सह शैक्षिक पहलुओं का ध्यान रखने की अपेक्षा की जाती है। यदि कोई किसी क्षेत्र में कमजोर है, तो नैदानिक मूलांकन किया जाना चाहिए और उपचारी उपाय अपनाए जाने चाहिए सतत् और व्यापक मूल्यांकन के कार्य एवं महत्व ये हैं

  • यह अध्यापक को प्रभावकारी कार्यनीतियाँ आयोजित करने में सहायता देता है।
  • सतत् मूल्यांकन शिक्षार्थी की प्रगति की सीमा और मात्रा को नियमित रुप से आँकने में सहायता देता है (विशिष्ट शैक्षिक और सह शैक्षिक क्षेत्रों के सन्दर्भ में योग्यता और उपलब्धि)।
  • सतत मूल्यांकन शिक्षार्थी कमजोरियों का निदान करने का कार्य करता है और अध्यापक को अलग अलग शिक्षार्थियों की शक्तियों और कमजोरियों और उसकी आवश्यकताओं का पता लगाने में सहायता दैता है। यह अध्यापक को तत्काल फीडबैक मुहैया करात है, जो तब यह फैसला कर सकता है कि कोई विशेष यूनिट अथावा संकल्पना समूची कक्षा को फिर से पढाए जाने की आवश्यकता है अथवा केवल कुछ शिक्षार्थियों को उपचारी शिक्षा की आवश्यकता है
  • सतत् मूल्यांकन के द्वारा बच्चे अपनी शक्तियों और कमजोरियों को जान सकते है। यह अभिवृत्तियों , और मूल्य प्रणालियों में होने वाले परिवर्तनों का पता लगाने में सहायता देता है
  • यह शैक्षिक और सह शैक्षिक क्षेत्रों में विद्दार्थियों की प्रगति के बारे में सूचना / रिपोर्ट देता है और इस प्रकार शिक्षार्थी की भावी सफलताओं के बारे में पूर्वानुमाम लगाने में सहायता देता है।
  • सतत् मूल्यांकन समय –समय पर बच्चे अध्यापकों और माता पिता को उपलब्धि के बारे में जागरुक बनाने में सहायता दैता है यदि उपलब्धि में कोई कमी हुई हो तो वे उसके सम्भाव्य कारणों की जाँच कर सकेत है और शिक्षा के उस क्षेत्र मे, जिसमें अदिक जोर देने की आवश्यकता हो , उपचारी उपाय कर सकते है बहुत तबार ऐसा होता है कि कुछ वैयाक्तिक कारणों, पारिवारिक समस्याओं अथावा समाजोजन की समस्याओं के कारण बच्चे अपने अध्ययन की उपेक्षा करना शुरु कर देते है, जिसके परिणामस्वरुप उनकी उपलब्धि में अचानक गिरावट आ जाती है यदि अध्यापक बच्चे और माता पिता को उपलब्धि में आई गिरावट का पता न चले तो बच्चे द्वारा अपने अध्ययन की उपेक्षा लम्बे समय तक की जाती रहती है और माता पिता को उपलब्धि में आई गिरावट का पता न चले तो बच्चे द्वारा अपने अध्ययन की उपेक्षा लम्बे समय तक की जाती रहती है और इसके परिणामस्वरुप उपलब्धि घटिया हो जाती है और बच्चे की शिक्षा प्राप्ति में स्थाई रुप से त्रुटि रह जाती है।
  • सतत् और व्यापक मूल्यांकन का मुख्य जोर विद्दार्थियों की निरन्तर संवृद्धि पर और उनका बौद्धिक, भावानात्मक, शारीरिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास सुनिश्चित करने पर होता है और इसलिए यह विद्दार्थी की केवल शैक्षिक उपलब्धियों को आँकने तक सीमित नही होगा यह मूल्यांकन का उपयोग शिक्षार्थियों को अन्य कार्यक्रमों के लिए अभिप्रेरित करने, सूचना प्रदान करने, फीडबैक की व्यवस्था करने और शिक्षा में शिक्षा प्राप्ति में सुधार करने के लिए व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करने के एक साधन के रुप में करता है।

सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन के साधन व विधियाँ(Adhigam ka Mulyakan Study Material in Hindi)

सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन के अन्तर्गत अपरिक्षेपी उपकरणों या तकनीक का प्रयोग किया जाता है, जैसे – निरीक्षण प्रश्नाली, साक्षात्कार, जाँच सूची ।

निरीक्षण गुडे तथा हाट के अनुसार, विज्ञान निरीक्षण से प्रारम्भ होता है और अपने तथ्यों की पुष्टि के लिए अन्त में मिरीक्षण का सहारा लेता है इस विधि के द्वारा सामुहिक व्यवहार तथा जटिल समास्याओं का अध्ययन भी सरलतापूर्वक किया जा सकता है। निरीक्षण विधि में अध्ययन सावधानीपूर्वक होता है, क्योकि अध्यापकर स्वयं प्रत्यक्ष रुप से भाग लेता है। इस विधि मे सामूहिक व्यवहार की जाँच भी की जाती है। यह विधि पूर्व वाल्यकाल में मूल्यांकन किए जाने का एहसास भी नही होता और अध्यापक प्राकृतिक परिस्थिति में बालक का मूल्यांकन कर पाते है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित होती है वस्तुनुष्ठता, निश्चयात्मता, क्रमबद्धता, प्रमाणिकता एवं विश्वसनीयता।

प्रश्नावली प्रश्नावली एक प्रकार का उत्तर प्राप्त करने का साधन है जिसके द्वारा उत्तरदाता स्वयं उसकी पूर्ति करता है। यह प्रश्नों की सुनियोजित सूचि होती है जिसके आधार पर बच्चों का मूल्यांकन किया जाता है। 0-6 वर्ष की अवस्था में बच्चों को चित्र प्रश्नावली दी जाती है जिससे प्रश्न चित्रों के रुप में होते है, बच्चे सही लगने वाले चित्रों को अकित करते है

साक्षात्कार साक्षात्कार वह विधि है जिसके द्वारा मौखिक अथवा लिखित सूचना प्राप्त की जाती है। साक्षात्कार द्वारा अध्यापुक बालक की प्रगति को ज्ञाप्त कर पाता है परन्तु इसमें प्रश्न इस प्रकार से दैनिक जीवन से सम्बन्धित होते है कि बालक को यह ज्ञात नही हो पात है कि यह उसका मूल्यांकन हो रहा है इस विधि से बालक अध्यापक के करीब आता है र निर्भर होका बात कर पाता है। इस विधि दावार विभिन्न मनोवैज्ञानिक व्याधियाँ भी दूर की जा सकती है।

जाँच –सूची जाँच सूची में अध्यापक बालक के सभी तथ्यों जैसे भाषा के प्रयोग सामाजिकता, संवेगात्मकता, खेल के दौरान व्यवहार आदि को लिखिते जाते है जिसकों बाद में एकत्रित कर बालक का मूल्यांकन होता है।

 
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